0
Advertisement

चाहत बिंदास जीवन की

जब मै तेरे पास होती
दिल की तमन्ना होती
खुद तुम्हारे स्नेह
में डुबूं उतरूं
और तुम्हें भी प्यार की
मीठी ताप से सहलाऊं
और नहलाऊं जी भर,
जिसमें सराबोर तुम
बिंदास जीवन
भूल जाओ अपने सारे थकान।
मन में उठती हिल्लोरें
तुम पर खुशियों
की बरसात करूं
और उसमें भींगकर
खुद का जीवन सवारूं।
वारि की खुशबू से
तेरे अंग अंग सुगंधित कर
अपने को धन्य समझूं।

पर मन को निराशा मिलती,
जब तुम मेरे पास होते
कुछ गुन धुन में परे होते
कितनी भी कोशिशें करूं
पर तुम्हें खुशियां दे न पाऊं
तुम्हें हंसी दे न पाऊं
मन मेरा व्याकुल विचलित होता।
मैं जब गंभीर होती हूं
तो तुम कुछ और समझते
समझते नही मन की दशा
मेरे जज्बात सारे ,
सोचते की मै तुम्हे गलत समझती
पर ये सच नही,
सदा जी जान से चाहत किया,
तुम्हे अपना सबकुछ अर्पण किया।

तुम मेरे जीवन
मेरी हर सांसो पर
दिल की धड़कनो पर
अपना एकछत्र राज किया।
जब भी चाहा मेरे पर
पुरी हुकुमत की
पर ये न समझे मेरे अंदर भी
इच्छाएं लालसाएं हैं
जो बिंदास जीवन की
चाहत रखती है।



रेणु रंजन
शिक्षिका, राप्रावि नरगी जगदीश
पत्रालय : सरैया, मुजफ्फरपुर
मो. - 9709576715

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top