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बात क्या हैं जो खफ़ा हो जाते हो 

बात क्या हैं जो खफ़ा हो जाते हो
राज क्या हैं जो तुम मुझसे छुपाते हो
तेरी ये नराजगी
अब बर्दाश नही होती हैं
अरे थोडा तो मुस्कुराओ
क्यों इतना सताते हो
जानती हूँ मैं
तुम्हारी हर बात
फिर क्यों हर
वक्त मुझे आजमाते हो
देख के लोग मुझे तेरा
नाम अब भी लेते है
और एक तुम हो
जो नजरें चुराते हो
इस बेदर्द दुनियां में
कोई समझ ना पाया
मुझे तुम सब समझ के भी
अनजान बन जाते हो
बात क्या है जो खफ़ा
हो जाते हो राज क्या हैं
जो मुझसे छुपाते हो ।।


सुनो

सुनो
मुझे कोई फर्क नही पड़ता
तुम्हारे समाज की बनाई
रिवायतों और ज़ंजीरों से
मैं जैसी हु ठीक हूँ
और मैं ऐसे ही
रहना पसन्द करती हूँ

तुम्हारी ढकोसलों मे
पिसती रही हूँ
जीकर भी जैसे
तड़पती रही हूँ

मुझे पसन्द है
अपना ही अश्क होना
आईने के सामने होकर भी
अपनी परछाई होना

जैसा मुझे ठीक लगेगा
मै करूंगी
जो तुम्हे लगे तुम करो
पर अपनी फ़िजूल की बातो
से परेसान ना करो

पता है मुझे
डरते हो तुम
कहि मै उड़ ना जाऊ
पंख फैला के फिर मुझे तुम्हारे
अस्तित्व की क्या जरूरत होगी

तुम्हारे अरमानों को रौंद कर
बड़ा सुक़ून मिल रहा है
बरसो बाद

तुम्हारा तुम जानो मै
खुद को ऐसे ही पसन्द करती हु
और ऐसे ही रहूंगी
तुम्हारी परवाह किये बिना


ये बंदिशें तो ना थी

ये बंदिशें तो ना थी,,
कि तू मुझे चाहें !
रुसवाइयों के डर से
नजरें चुराता क्यों है !!
यें मिलन रूहों का है,
इसमें गलत क्या है
तो फिर तू खुद को
यूं आजमाता क्यों है !!
न हमसफ़र ही रही
न मंजिल हूं तेरी
हाथ थाम कदमो से कदम
मिलाता क्यों है !!
तेरे बगैर तो पहले से ही,
बेमानी सी है जिंदगी
रंग दामन में भर के खाख मे
उडाता क्यों है !!
कटघरे में खड़ी
खुद के सवालों से जूझती मैं
मुझे दूर तलक ला,
बीच राह छोड जाता क्यों है ???????????




रचनाकार परिचय 
कविता त्रिपाठी 
गोरखपुर 
हिन्दी साहित्य 
बर्तमान में बी. टी. सी अध्यन

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