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अंश ढूँढ़ता फिरता हूँ 

नजर है पड़ती जब बगिया पर, बस सूनापन ही दिखता है ।
इधर उधर इन झोंपडियों से  बस धुँआ सा उठता दिखता है ।
बरगद के नीचे निर्मित  अभिनय वाला मंच ढूँढ़ता फिरता हूँ ।।
घर को जाती इन गलियों में ,बचपन के अंश ढूँढ़ता फिरता हूँ ।।
मनोज कुमार सामरिया “मनु”
मनोज कुमार सामरिया “मनु”
किस  की मर्यादा की खातिर जिसने कानन स्वीकार किया ।
फूलों से नाजुक पाँवो ने ,काँटों का दामन स्वीकार किया ।
आज उसी की जनकपुरी में ,सीता के अवशेष ढूँढ़ता फिरता हूँ ।।
भाई के संग संग वन जाए , ऐसे लखन विशेष ढूँढ़ता फिरता हूँ ।।
हाथ हाथ को नहीं जानता अपने भी हो गए पराए ,
खुद के घर की नींव खोदकर बैठे है जो शीश झुकाए ।।
आज उसी रावण की नगरी में मेघनाद के दंश ढूँढ़ता फिरता हूँ ।।
आज उसी लंकानगरी में विभीषण के अंश ढूँढ़ता फिरता हूँ ।।
आज देखता हूँ गोकुल तो तो नजरों धोखा खाती है ,
रस्म निभाने को कुछ सखियाँ राधा का स्वाँग रचाती है ।
गोकुल की गलियों में अब मैं राधा सरीखी प्रीत ढूँढ़ता फिरता हूँ ।।
श्रीदामा को सखा मानते कान्हा जैसा मीत ढूँढ़ता फिरता हूँ ।।
उगते सूरज के संग जाता ,बढते चँदा बाद वो  आता ।
तकनीक के बढते युग में अपनेपन को भूलता जाता ।
मशीन बने इस भूमि - पुत्र में ,मानवता के अंश ढूँढ़ता फिरता हूँ ।।
राम कृष्ण की इस भूमि पर सच्चाई के अंश ढूँढ़ता फिरता हूँ ।।
                 

 - मनोज कुमार सामरिया “मनु”


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