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मेरी वो

वो एक आदत है
जो चिपकी है तन मन से।
वो शराब है।
जो नशा उतारती है।
खोल देती है ताले।
चाहे कितने भी जंग
लगे क्यों न हों।
कल्पना की दुनिया से वो
खींच लेती है सच्चाई
के धरातल पर।
महीने की कमाई
बच्चों की पढ़ाई
नमक तेल से लेकर
रिश्तों की गांठों तक
वह खोलती हैं परतें
मन की उन्मुक्त उड़ान को
पल भर में अपने चाबुक से
ला खड़ा करती है धरातल पर
अवसाद और कष्ट के गहन
पलों को चुनकर बाहर निकालती है मन से।
वो एक स्तंभ की भांति
थामें रहती है पूरे घर को।
उसके अक्ष पर घूमते है
सारे रिश्ते सारी वर्जनाएं
वो काल के कपाल पर लिखा
एक अमिट चिन्ह है।
एक प्रतीक जो परिभाषित
करता है परिवार के अस्तित्व को।
उगते सूरज से लेकर फिर उगते
सूरज तक सिर्फ उसका ही साम्राज्य होता है।
ये अलग बात है कि उस
साम्राज्य का विरोध आपको
कष्ट देता है और उसका
संधारण जीवन को गति।

-सुशील शर्मा

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