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तेरी शिकायत हर रात मैं लिखता हूँ

तेरे ख्यालात की हर बात मैं लिखता हूँ...
जो मिला है तुझसे वो साज मैं लिखता हूँ
मैं लिखता हूँ

कैसे भूल जाते है आप दुनिया के सितम को..
तुम्हारे शहर की नई वारदात मैं लिखता हूँ

तुम समझो या न समझो मेरे दिल के अरमान...
सोच-समझकर अपना जज्बात मैं लिखता हूँ

सुन-सुन कर दुनिया की गर्दीशे थक जाता हूँ मैं
फुरसत में तेरी शिकायत हर रात मैं लिखता हूँ

गम से घबराना नही वरना उम्मींद टूट जायेगी तुमसे ...
गम न करना तेरे लिए कोई निजात मैं लिखता हूँ

हम चलते चले गए !

दिल चीज नही है लेकिन रखते चले गए 
तुम ठहर गए हम चलते चले गए !

तेरी निगाह में दरिया भी न था हमदम
फिर भी हम तो डूबते चले गए !

तुम्हारे घर की राहे इतनी खराब हालात है 
फिर भी हम लडखडाते चले गए !

जब भी उठाना चाहा अपने टूटे हाथों से 
तुम रेत की तरह फिसलते चले गए !

मैं खाक में मिलकर तुम्हें जितना सम्हाला 
रास्तों की तरह तुम बिगडते चले गए !

मेरे गांव में अन्धरों का दरबार लगे है !

बेबसी में उम्मींदे कितने लाचार लगे है .. 
फिर भी जिन्दगी के कितने अम्बार लगे है !

ये जिन्दगी भी ना इक अजीब शहर है 
यहां ना जाने कैसे-कैसे बाजार लगे है !

तेरे हुकूमत का क़ानून कई बिस्तरों से गुजरी 
फिर भी शासन चलाने में सरकार लगे है !

कैसे सुनाती आवाम अपनी तहरीर ये जमीं
हुक्मरानों के दर पे ऊँचे-ऊँचे दीवार लगे है !

क्या खूबियों में सज जाती है तेरे घर की शक्ल
और मेरे गांव में अन्धरों का दरबार लगे है !


यह रचना राहुलदेव गौतम जी द्वारा लिखी गयी है .आपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की है . आपकी "जलती हुई धूप" नामक काव्य -संग्रह प्रकाशित हो चुका  है .
संपर्क सूत्र - राहुल देव गौतम ,पोस्ट - भीमापर,जिला - गाज़ीपुर,उत्तर प्रदेश, पिन- २३३३०७
मोबाइल - ०८७९५०१०६५४

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