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हिन्दी एक महासागर 

हिन्दी अब दरिया नहीं रहा वरन अनवरत विकास की प्रक्रिया पर चलकर महासागर बन गया है । हिन्दी भाषी
हिन्दी एक महासागर
लोग इस तथ्य से परिचित हैं कि इस भाषा ने वर्तमान रूप पाने के लिए कितने परिवर्तन व  संसोधन झेले हैं । आज अगर यह हमारे सम्मुख विशाल महासागर के रूप में आने से पूर्व नियमों के कठोर धरातल के प्रष्ठ  पर प्रवाहित  होकर स्वयं को सिद्ध किया है । यह  वैज्ञानिकता  के तर्कों की कसौटी पर भी कसी गई और खरी उतरी । इसे प्रमाणिक एवं वैज्ञानिक भाषा का दर्जा सहज में ही नहीं मिला । ये इसकी योग्यता एवं क्षमता का धोतक है । यह  भाषा  लोकभाषा बनकर जन जन की जिह्वा पर सजी है । अनेक उपभाषाओं और  बोलियों  को स्वीकार कर अपनी सहृदयता का परिचय दिया है ।
कई बार यह  बात वाद का विषय रही है कि इस भाषा में प्रयुक्त  अन्य देशी ,क्षेत्रीय , विदेशी शब्दों का  प्रचलन इसके अस्तित्व के लिए खतरा है ।इन शब्दों के समावेश से यह अपना रूप खो देगी । इस हेतु हमें विस्तृत चिंतन की आवश्यकता है । बंधुओं अगर यह अन्य भाषागत शब्दों के स्वीकार करती है तो क्या गलत है वरन यह तो इसका विस्तार है । निःसन्देह फैलावे है ।
इन शब्दों के समावेश से इसके अस्तित्व को खतरा भी बताया जा रहा है मगर यह समावेश समय की माँग है ।यह हिन्दी का परिष्कार है जो शैने शैने यह रूप अपना रही है । हाँ मैं इस बात को स्वीकार करता हूँ भाषागत शब्दों के प्रयोग से इसका स्वरूप मौलिक नहीं रहा परन्तु यह परिवर्तन समय की माँग है हमें इसे स्वीकार करना चाहिए । 
आज हिन्दी भाषी समूह के लिए यह हर्ष का विषय है कि हिन्दी भाषी परिवार उत्तरोत्तर बढ़ता ही जा रहा है । यह विश्वास स्तर पर सर्वाधिक बोली जाने वाली जनभाषा है ।यह क्षेत्रियता की दीवारों को लाँघकर यह विश्व में व्याप्त होती जा रही है ।मेरे विचारों से इसी कारण इसमें अन्य भाषागत शब्दों का आगमन हो रहा है जो की इसके विस्तार का सूचक है । इस बाबत मैं एक उदाहरण भारतीय संस्कृति का देना चाहूँगा जिसने विदेशी आक्राँन्ताओं को सहा , कई संस्कृतियाँ इससे मिली इसने संस्कृतियाें के बनते बिगड़ते देखा । इसमें इन संस्कृतियाें का संक्रमण हुआ परन्तु यह आज भी अपने यथावत रुप से विद्यमान है । इसका कोई उचित कारण नजर आता है तो वह है इसकी ग्रहणशीलता । अपनी इस विशेषता के चलते इसने सभी संस्कृतियाें के गुणों को अपनी विशालता में समेट लिया । इसकी उदारता के बारे में कवि इकबाल ने कहा था - 

युनान , मिश्र ,रोमाँ सब मिट गए जहाँ से ,
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी .....।।

ये बात कुछ और नहीं बस उदारता और ग्रहणशीलता है ।  हिन्दी भाषा भी यदि अन्य भाषागत शब्दों के स्वीकार करती है तो यह उसके लिए नुकसानदेह नहीं वरन लाभप्रद है । इन्ही भिन्न भाषागत शब्द रूपी नदियों व झरनों से मिलकर निरन्तर प्रवाहित होने वाली हिन्दी अब हिमनद का  रूप धारण कर चुकी है जो कि विशाल जनसमूह के हृदय को सींचित करती है ।  इसका सतत् प्रवाह इसी भाँति बना रहे यही मेरी कामना है । 
                                                    


यह रचना मनोज कुमार सामरिया “मनु” जी द्वारा लिखी गयी है।  आप, गत सात वर्ष से हिन्दी साहित्य शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं। अनेक बार मंच संचालक के रूप में सराहनीय कार्य किया । लगातार कविता लेखन,सामाजिक सरोकारों से जुड़े लेख ,वीर रस एंव श्रृंगार रस प्रधान रचनाओं का लेखन करते हैं।  वर्तमान में रचनाकार डॉट कॉम पर रचनाएँ प्रकाशित एवं  कविता स्तंभ ,मातृभाषा .कॉम पर भी रचना प्रकाशित ,दिल्ली की शैक्षिक पत्रिका मधु संबोध में भी प्रकाशन हो चुका है।
संपर्क सूत्र :- प्लाट नं. A-27  लक्ष्मी नगर 4th ,
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