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बदरा बरसा हैं

घनघोर घटा संग हवा
"प्रेम" मेघ बन बरसा है।
बदरा बरसा हैं
                 श्याम बिन मन बावरा
                 और, बदरा सावन बन गरजा है।
स्वपन में देख पिय को
हर्ष मगन मन में कामना "केेली" का आ धड़का है।
                  खिल उठा गुलाब यौवन का
                  अंग-अंग में "रास" उमंग सा भड़का है।
अवनी में छाये बदरा जहाँ छिप श्याम
मुझपे "प्रेम" मेघ बन बरसा है।
                    बरस "बदरा" लगता तन चूमता,
                    बावरा मन श्याम मिलन को तरसा है।
रस-राग लगन में हृदय झूमता
नैन मेरे पिय दर्श को तड़पा है।
                     गरज-गरज कर बरस "बदरा"
                     "ज्वाला" बूँद बन झरता है।
                                           - बीणा चौधरी

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