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बदली हवा

कल हवा जो चली कुछ बदली लगी
वो अपनी नहीं कुछ पराई लगी
बदली हवाखिड़कियां बंद कर ली, ना घर से गये
इस बदली हवा से हम डर से गये।
कल हवा जो चली..............

डर जिसका था, आखिर वही हो गया
हम छुप सा गया मैं प्रकट हो गया
रिश्तों में वो पहली महक ना रही
एक मैं, एक तू की ही दुनिया बनी।
कल हवा जो चली.........................

घटा जाने कैसी यहां छा गई
संस्कृति उसमें अपनी समा सी गई
मूल्य अपनी धरा के बिखरने लगे
नग्नता नाच अपना दिखाने लगी।
कल हवा जो चली.....................

पूर्वजों की बनाई डगर छोड़कर
कौन सी राह पर जाने हम चल पड़े
प्रेम का अर्थ मन का मिलन ना रहा
रूप-यौवन भ्रमर को रिझाने लगी।
कल हवा जो चली...................

अर्थ को इष्ट सब मानने हैं लगे
अर्थ ही संगी-साथी, कुटुम्ब बन चले
झूठ के पांव हर घर, नगर बढ़ चले
सच की परछाईयां भी डराने लगी।
कल हवा जो चली..................


यह रचना तरु श्रीवास्तव जी द्वारा लिखी गयी है . आप कविता, कहानी, व्यंग्य आदि साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन कार्य करती हैं . आप पत्रकारिता के क्षेत्र में वर्ष 2000 से कार्यरत हैं। हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, अमर उजाला, हरिभूमि, कादिम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में बतौर स्वतंत्र पत्रकार विभिन्न विषयों पर कई आलेख प्रकाशित। हरिभूमि में एक कविता प्रकाशित। दैनिक भास्कर की पत्रिका भास्कर लक्ष्य में 5 वर्षों से अधिक समय तक बतौर एडिटोरियल एसोसिएट कार्य किया। तत्पश्चात हरिभूमि में दो से अधिक वर्षों तक उपसंपादक के पद पर कार्य किया। वर्तमान में आप ,प्रभात खबर समाचारपत्र में कार्यरत हैं.आकाशवाणी के विज्ञान प्रभाग के लिए कई बार विज्ञान समाचार का वाचन यानी साइंस न्यूज रीडिंग किया।

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