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सोच तुम्हारी

सोच तुम्हारी
सोन चिरैया
फुदक - फुदक कर मुझ तक आती है
कोमल - कोमल
रंग बिरंगी
सोन चिरैया
मन रंगीला कर जाती है
हँसी तुम्हारी
चंचल हिरनी
उछल कूद मचाती है
मन के मेरे सूने जंगल में
कोलाहल भर जाती है
दृष्टि तुम्हारी
कली गुलाब की
खिलकरके छा जाती है
मन कण्टक के बीहड़ को
सुरभि सुन्दर से
गुलशन गुलशन कर जाती है..

2-शनैः शनैः

डा० महेन्द्र नारायण
डा० महेन्द्र नारायण
मधुर-मधुर गीतों में
ढ़ल रहा हूँ शनैः शनैः
शब्द मुझको थामें हैं
द्वन्द्व के विचारों में
फिर भी कर्णप्रिय धुनों में
पल रहा हूँ शनैः शनै
तान मुझको छेड़ें हैं
लय मुझे मरोड़ें हैं
फिर भी ता धिना धिन पर
चल रहा हूँ शनैः शनैः
बन रही हैं कविताएँ
गीत बनकर तरु लताएँ
फिर भी राग बासन्ती में
बदल रहा हूँ शनैः शनैः ...



रचनाकार परिचय 

डा० महेन्द्र नारायण

स्थान-----ग्राम व पोष्ट --भीषमपुर चकिया चन्दौली वाराणसी उ०प्र०
शिक्षा---एम०ए०,पी-एच०डी०(बी०एच०यू०)
लगभग 3हजार विभिन्न विधाओं में रचनाएं
अनेक प्रकाशित
मुक्तिरेखा' व 'द्रौपदी की दुम ' दो कहानी संग्रह प्रकाशित
पिछले २५वर्षों से निरन्तर डायरी लेखन
प्रधान सम्पादक "प्रेरणा"(कालेज पत्रिका)
सम्पर्क -----श्री चन्दन लाल नेशनल कालेज काँधला शामली उ०प्र०247775
मो०नं० 9412637489

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