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मारेय नाम का किसान


                           
                                                        --- मूल कथाकार : फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की
                                                        --- अनुवाद : सुशांत सुप्रिय



               वह ईस्टर के हफ़्ते का दूसरा दिन था । हवा गर्म थी , आकाश नीला था । सूरज गर्माहट देता हुआ देर तक आकाश में चमक रहा था , पर मेरा अंतर्मन बेहद अवसाद-ग्रस्त था । टहलता हुआ मैं जेल की बैरकों के पीछे जा निकला । सामान स्थानांतरित करने वाली मशीनों को गिनते हुए मैं बंदी-गृह की मज़बूत चारदीवारी को घूरता रहा । हालाँकि उनको गिनने का मेरा कोई इरादा नहीं था , पर यह मेरी आदत ज़रूर थी । बंदी-गृह में यह मेरी ' छुट्टियों ' का दूसरा दिन था । आज बंदियों को काम करने के लिए नहीं ले जाया गया था । बहुत सारे लोग ज़्यादा पी लेने के कारण नशे में थे । हर कोने से लगातार गाली-गलौज और लड़ने-झगड़ने की ऊँची आवाज़ें आ रही थीं । बिस्तरों के साथ बने चबूतरों पर ताश-पार्टियों और बेहूदा , घटिया गानों का प्रबंध किया गया था । हिंसा में लिप्त होने की वजह से कई क़ैदियों को उनके सहकर्मियों ने अधमरे होने तक पीटे जाने की सज़ा सुनाई थी । पूरी तरह ठीक हो जाने तक वे सभी भेड़ों की खालें लपेटे बिस्तरों पर निढाल पड़े थे ।
         
फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की
फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की
    लड़ाई-झगड़ों के दौरान यहाँ बात-बात पर चाकू-छुरे निकल जाते थे । पिछले दो दिनों की छुट्टियों के दौरान मुझे इन सब ने इतना उत्पीड़ित कर दिया कि मैं बीमार हो गया । नशेड़ियों का इतना ज़्यादा घृणित शोर-शराबा और इतनी अव्यवस्था मैं वाकई कभी नहीं सह सकता था ,  विशेष कर के इस जगह पर । ऐसे दिनों के दौरान बंदी-गृह के अधिकारी भी बंदी-गृह की कोई सुध नहीं लेते थे । इन दिनों वे यहाँ कोई तलाशी नहीं लेते थे , न वोदका की अवैध बोतलें ढूँढ़ निकालने के लिए छान-बीन ही करते थे । उनका मानना था कि इन बहिष्कृत लोगों को भी साल में एकाध बार मौज-मस्ती करने की अनुमति मिलनी चाहिए । यदि ऐसा नहीं हुआ तो स्थिति और ख़राब हो सकती है । आख़िरकार मेरा मन इस स्थिति के विरुद्ध ग़ुस्से से भर उठा ।
              इस बीच एम. नाम का एक राजनीतिक बंदी मुझे मिला । उसने मुझे विषाद भरी आँखों से देखा । अचानक उसकी आँखों में एक चमक आई और उसके होठ काँपे । " सब के सब डाकू-बदमाश हैं " , गुस्से से उसने कहा और आगे बढ़ गया । मैं बंदी-कक्ष में लौट आया , हालाँकि केवल पंद्रह मिनट पहले मैं दौड़कर यहाँ से बाहर निकल गया था , जैसे मुझ पर पागलपन का दौरा पड़ा हो । दरअसल छह हट्टे-कट्टे बंदी नशे में धुत्त तातार गज़िन पर टूट पड़े थे । उसे नीचे दबा कर उन्होंने उसकी पिटाई शुरू कर दी थी । वे उसे जिस बेवक़ूफ़ाना ढंग से मार रहे थे  उससे तो किसी ऊँट की भी मौत हो सकती थी । पर वे जानते थे कि हरक्यूलिस जैसे इस तगड़े आदमी को मार पाना इतना आसान नहीं था । इसलिए वे उसे बिना किसी संकोच या घबराहट के पीट रहे थे ।
              अब वापस लौटने पर मैंने पाया कि सबसे दूर वाले कोने के बिस्तर पर गज़िन लगभग बिना किसी जीवन के चिह्न के बेहोश पड़ा था । उसके ऊपर भेड़ की खाल डाल दी गई थी । सभी बंदी बिना कुछ बोले उसके चारो ओर से आ-जा रहे थे ।
हालाँकि उन सभी को पूरी उम्मीद थी कि अगली सुबह तक वह होश में आ जाएगा , पर यदि उसकी किस्मत ख़राब रही होती तो यह भी सम्भव था कि इतनी मार खाने के बाद वह मर जाता । मैं किसी तरह जगह बनाता हुआ लोहे की छड़ों वाली खिड़की के सामने मौजूद अपने बिस्तर तक पहुँचा , जहाँ मैंने अपने हाथ अपने सिर के पीछे रख लिए और पीठ के बल लेट कर अपनी आँखें मूँद लीं । मुझे इस तरह लेटना पसंद था ; सोए हुए आदमी को आप तंग नहीं कर सकते । और इस अवस्था में आप सोच सकते हैं और सपने देख सकते हैं ।
              लेकिन मैं सपने नहीं देख सका । मेरा चित्त अशांत था । बार-बार एम. के कहे शब्द मेरे कानों में गूँज रहे थे । पर मैं अपने विचारों की चर्चा क्यों करूँ ? अब भी कभी-कभी रात में मुझे उन दिनों के बारे में सपने आते हैं , और वे बेहद यंत्रणादायी होते हैं । शायद इस बात पर ध्यान दिया जाएगा कि आज तक मैंने बंदी-गृह में बिताए अपने जीवन के बारे में लिखित रूप में शायद ही कभी कोई बात की है। पंद्रह वर्ष पूर्व मैंने ' मृतकों का घर ' नामक किताब एक ऐसे काल्पनिक व्यक्ति के चरित्र पर लिखी थी जो अपराधी था और जिसने अपनी पत्नी की हत्या की थी । यहाँ मैं यह बता दूँ कि तब से बहुत सारे लोगों ने यह मान लिया है कि मुझे बंदी-गृह इसलिए भेजा गया क्योंकि मैंने ही अपनी पत्नी की हत्या कर दी थी !
              धीरे-धीरे मैं भुलक्कड़पन की अवस्था में चला गया , और फिर यादों में डूब गया । बंदी-गृह में बिताए अपने पूरे चार साल के दौरान मैं लगातार अपने अतीत की घटनाओं को याद करता रहता , और लगता था जैसे उन यादों के सहारे मैं अपना पूरा जीवन दोबारा जी रहा था । दरअसल ये स्मृतियाँ खुद-ब-खुद मेरे ज़हन में उमड़-घुमड़ आती थीं , मैं जान-बूझकर इन्हें याद करने की कोशिश नहीं करता था । कभी-कभी किसी अलक्षित घटना से इनकी शुरुआत होती , और धीरे-धीरे ज़हन में इनकी पूरी जीवंत तसवीर बन जाती । मैं इन छवियों का विश्लेषण करता , बहुत पहले घटी किसी घटना को नया रूप दे देता , और सबसे अच्छी बात यह थी कि मैं अपने मज़े के लिए इन्हें लगातार सुधारता रहता ।
               इस अवसर पर किसी कारणवश मुझे अचानक अपने बचपन का एक अलक्षित पल याद आया जब मैं नौ वर्ष का था । यह एक ऐसा पल था जिसके बारे में मुझे लगा था कि मैं इसे भूल चुका था । पर उस समय मुझे अपने बचपन की स्मृतियों से विशेष लगाव था । मुझे गाँव में बने अपने घर में बिताए अगस्त माह की याद आई ।
वह एक शुष्क , चमकीला दिन था जब तेज़ , ठंडी हवा चल रही थी । गर्मी का मौसम अपने अंतिम चरण में था और जल्दी ही हमें मास्को चले जाना था , जहाँ ठंड के महीनों में हम फ़्रांसीसी भाषा के पाठ याद करते हुए ऊब जाने वाले थे । इसलिए मुझे ग्रामीण इलाक़े में बने अपने घर को छोड़ने का बेहद अफ़सोस था । मैं मूसल से कूट-पीट कर अनाज निकालने वाली जगह के बगल से चलता हुआ गहरी , संकरी घाटी की ओर निकल गया । वहाँ मैं घनी झाड़ियों के झुरमुट तक गया जिसने उस संकरी घाटी को कौप्से तक ढँका हुआ था । मैं सीधा उन झाड़ियों के बीच घुस गया , और वहाँ मुझे लगभग तीस मीटर दूर बीच की ख़ाली जगह में खेत को जोतता हुआ एक किसान दिखा । मैं जानता था कि वह खड़ी ढलान वाली पहाड़ी पर जुताई कर रहा
था , और उसके हाँफ़ते हुए घोड़े को बहुत प्रयास करना पड़ रहा था । अपने घोड़े का हौसला बढ़ाने वाली किसान की आवाज़ हर थोड़ी देर बाद तैरती हुई मेरी ऊँचाई तक पहुँच रही थी ।
                मैं अपने इलाक़े में रहने वाले लगभग सभी गुलाम किसानों को जानता
था । पर इस समय कौन-सा किसान खेत जोत रहा था , यह मुझे नहीं पता था । सच पूछिए तो मैं यह जानना भी नहीं चाहता था क्योंकि मैं अपने काम में डूबा हुआ था । आप कह सकते हैं कि मैं अखरोट के पेड़ की डंडियाँ तोड़ने में व्यस्त था । मैं उन डंडियों से मेंढकों को पीटता था । अखरोट के पेड़ की पतली डंडियाँ अच्छे चाबुक का काम करती हैं , लेकिन वे ज़्यादा दिनों तक नहीं चलती हैं । पर भोज-वृक्ष की पतली टहनियों का स्वभाव इससे ठीक उलट होता है । मेरी रुचि भौंरों और अन्य कीड़ों में भी थी ; मैं उन्हें एकत्र करता था । इनका उपयोग सजावटी था । काले धब्बों वाली लाल और पीले रंग की छोटी , फुर्तीली छिपकलियाँ भी मुझे बहुत पसंद थीं , लेकिन मैं साँपों से डरता था । हालाँकि साँप छिपकलियों से ज़्यादा विरल थे ।
               वहाँ बहुत कुकुरमुत्ते होते थे । खुँबियों को पाने के लिए आपको भोज-वृक्षों के जंगल में जाना पड़ता था और मैं वहाँ जाने ही वाला था । पूरी दुनिया में मुझे और किसी चीज़ से उतना प्यार नहीं था जितना उस जंगल से और उसमें पाई जाने वाली चीज़ों और जीव-जंतुओं से -- कुकुरमुत्ते और जंगली बेर , भौंरे और रंग-बिरंगी चिड़ियाँ , साही और गिलहरियाँ । जंगल में ज़मीन पर गिरी नम , मरी पत्तियों की गंध मुझे अच्छी लगती थी । इतनी अच्छी कि यह पंक्ति लिखते समय भी मैं भोज-वृक्षों के उस जंगल की गंध को सूँघ रहा हूँ । ये छवियाँ जीवन भर मेरे साथ रहेंगी । उस गहरी स्थिरता के बीच अचानक मैंने स्पष्ट रूप से किसी के चिल्लाने की आवाज़ सुनी -- " भेड़िया ! " यह सुनकर मैं बुरी तरह डर गया और ज़ोर से चीख़ते-चिल्लाते हुए मैं सीधा बीच के ख़ाली जगह में खेत जोत रहे उस किसान की ओर भागा ।
                अरे , वह तो मारेय नाम का हमारा गुलाम किसान था । मुझे नहीं पता कि ऐसा कोई नाम होता भी है , किंतु सभी उसे मारेय नाम से ही बुलाते थे । वह गठीले बदन वाला पचास साल का मोटा-तगड़ा किसान था , जिसकी भूरी दाढ़ी के कई बाल पके हुए थे । मैं उसे जानता था , हालाँकि मुझे पहले कभी उससे बात करने का मौक़ा नहीं मिला था । मेरी चीख़ सुनकर उसने अपना घोड़ा रोक लिया और हाँफ़ते हुए जब मैंने एक हाथ से उसके हल को और दूसरे हाथ से उसकी क़मीज़ के कोने को पकड़ा , तब उसने देखा कि मैं कितना डरा हुआ था ।
                  " यहाँ कहीं एक भेड़िया है । " मैं हाँफ़ते हुए चिल्लाया ।
                  एक पल के लिए उसने अपना सिर चारो ओर ऐसे घुमाया जैसे उसे मेरी बात पर लगभग यक़ीन हो गया हो ।
                   " कहाँ है भेड़िया ? "
                   " कोई चिल्लाया था -- ' भेड़िया ' ... । " मैं हकलाते हुए बोला ।
                   " बकवास । बिल्कुल बेकार बात । भेड़िया ? अरे , वह तुम्हारी कल्पना होगी ! यहाँ भेड़िया कैसे हो सकता है ? " मुझे आश्वस्त करते हुए वह बोला । लेकिन मैं अभी भी डर के मारे थर-थर काँप रहा था और मैंने अभी भी उसकी क़मीज़ का कोना पकड़ रखा था । मैं काफ़ी डरा हुआ लग रहा हूँगा । उसने मेरी ओर एक फ़िक्र-
भरी मुस्कान दी । ज़ाहिर है , मेरे कारण वह तनाव-ग्रस्त और चिंतित महसूस कर रहा था ।
                  " अरे , तुम तो बेहद डर गए हो ! " वह सिर हिलाते हुए बोला । " मेरे प्यारे बच्चे ... सब ठीक होगा ! " अपना हाथ आगे बढ़ा कर वह मेरे गालों को थपथपाने लगा ।
                  " आओ , आओ ; ईश्वर सब ठीक करेगा । ईश्वर का नाम लो ! "
                  लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया । मेरे मुँह के कोने अब भी फड़क रहे थे , और उसने इसे देख लिया । उसने अपनी काले नाख़ून वाली मोटी , मिट्टी लगी उँगली आगे बढ़ाई और हल्के-से मेरे फड़कते हुए होठों को छुआ ।
                  " चलो , शाबाश , शाबाश , " माँ-जैसी कोमल , हल्की मुस्कान देते हुए उसने कहा , " प्यारे बच्चे , कुछ नहीं होगा । चलो , शाबाश ! "
                  आख़िर मैं समझ गया कि वहाँ कोई भेड़िया नहीं था , और जो चीख़ मैंने सुनी थी वह महज़ मेरी कल्पना की उपज थी । हालाँकि वह चीख़ बेहद स्पष्ट थी , पर मैं ऐसी चीख़ों ( केवल भेड़ियों के बारे में ही नहीं ) की कल्पना पहले भी एक-दो बार कर चुका था । मैं यह बात जानता था । ( जैसे-जैसे मैं बड़ा होता गया , मेरे ये निर्मूल भ्रम ख़त्म होते गए । )
                   " ठीक है , तो अब मैं चलूँगा , " मैंने सहमी आवाज़ में उससे कहा ।
                   " ठीक है , मैं तुम्हें जाते हुए दूर तक देखता रहूँगा । मैं भेड़िये को तुम्हारे पास नहीं आने दूँगा । " वह अब भी माँ-जैसी कोमल मुस्कान बिखेरता हुआ
बोला , " ईश्वर तुम्हारी रक्षा करें । चलो शाबाश , भागो । " फिर उसने ज़ोर से ईश्वर का नाम लिया । मैं हर दसवें क़दम पर मुड़ कर पीछे देखते हुए आगे बढ़ने लगा । मारेय अपने घोड़े के साथ वहीं स्थिर खड़ा था । जितनी बार मैं पीछे मुड़ कर उसे देखता , वह सिर हिला कर मेरा हौसला बढ़ाता । मुझे यह मानना होगा कि मारेय के सामने खुद को इतना डरा हुआ पा कर मैं शर्मिंदा महसूस कर रहा था । पर सच्चाई यही थी कि मैं अब भी भेड़िए के बारे में सोच कर डरा हुआ था । चलते-चलते उस सँकरी घाटी की आधी ढलान पार करके मैं पहले भुसौरे तक पहुँचा । वहाँ पहुँच कर मेरा डर पूरी तरह ग़ायब हो गया । उसी समय मेरा झबरा कुत्ता वॉल्तचोक पूँछ हिलाते हुए दौड़ कर मेरे पास पहुँचा । कुत्ते के आ जाने से मैं खुद को सुरक्षित महसूस करने लगा । मैंने मुड़ कर अंतिम बार मारेय की ओर देखा । हालाँकि अब मुझे उसका चेहरा साफ़-साफ़ नहीं दिख रहा था , पर मुझे लगा जैसे वह अब भी मेरी ओर देख कर सिर हिला रहा था और प्यार से मुस्करा रहा था । मैंने उसकी ओर अपना हाथ हिलाया । जवाब में उसने भी मेरी ओर अपना हाथ हिलाया और फिर वह अपने घोड़े से मुख़ातिब हो गया , " चल, शाबाश ! " दूर वहाँ मैंने दोबारा उसकी आवाज़ सुनी और फिर उसके घोड़े ने खेत जोतना शुरू कर दिया ।
                 पता नहीं क्यों , मुझे ये सारी छोटी-छोटी बातें भी असाधारण रूप से अचानक याद आ गईं । कोशिश करके मैं अपने बिस्तर पर उठ कर बैठ गया । मुझे याद है , अपनी स्मृतियों के बारे में सोच कर मैंने स्वयं को चुपचाप मुस्कराता हुआ पाया । मैं उस सब के बारे में थोड़ी देर और सोचता रहा ।
                  जब उस दिन मैं घर वापस आया तो मैंने किसी को भी मारेय के साथ हुए अपने ' संकटपूर्ण ' अनुभव के बारे में कुछ नहीं बताया । और सच कहूँ तो इसमें संकटपूर्ण जैसा कुछ भी नहीं था । और वास्तविकता यही है कि जल्दी ही मैं मारेय और इस घटना के बारे में भूल गया । यदा-कदा जब भी मेरी उससे मुलाक़ात हो जाती तो मैं उससे भेड़िये या उस दिन की घटना के बारे में कभी बात नहीं करता । पर बीस बरस बाद अचानक आज साइबेरिया में मुझे मारेय के साथ हुई अपनी वह मुलाक़ात और उसकी एक-एक बात बिल्कुल स्पष्ट रूप से याद आई । इस घटना की याद अवश्य ही मेरी आत्मा में कहीं छिपी हुई थी , हालाँकि ऊपर-ऊपर से मुझे इसके बारे में कुछ भी नहीं पता था । और जब मुझे इसकी ज़रूरत महसूस हुई तो यह अचानक मेरी स्मृति में पूरी शिद्दत से उठ खड़ी हुई ।
                 मुझे उस बेचारे गुलाम कृषक के चेहरे पर मौजूद माँ-जैसी मृदु मुस्कान याद आई , और यह भी याद आया कि कैसे उसने अपनी उँगलियों से मुझ पर ईसाई धर्म के क्रॉस का चिह्न बनाया ताकि मैं हर मुसीबत से बचा रहूँ । मुझे उसका यह कहना भी याद आया , " अरे , तुम तो बेहद डर गए हो । मेरे प्यारे बच्चे , सब ठीक होगा । " और मुझे विशेष रूप से मिट्टी लगी उसकी उँगलियाँ याद आईं जिनसे उसने संकोचपूर्ण कोमलता से भर कर मेरे फड़फड़ाते होठों को धीरे से छुआ था । यदि मैं उसका अपना बेटा रहा होता तो भी वह इससे अधिक स्नेह-भरी चमकती आँखों से मुझे नहीं देखता । और किस चीज़ ने उसे ऐसा बना दिया था ? वह तो हमारा गुलाम कृषक था और कहने के लिए मैं उसका छोटा मालिक था । वह मेरे प्रति दयालु था , इस बात का पता न किसी को चलना था , न ही कोई उसे इसके लिए इनाम देने वाला था । क्या शायद छोटे बच्चों से उसे बहुत प्यार था ? कुछ लोगों का स्वभाव ऐसा होता है । वीरान खेत में यह मुझसे उसकी अकेली मुलाक़ात थी । शायद यह केवल ईश्वर ने ही ऊपर से देखा होगा कि एक रूसी गुलाम कृषक का हृदय कितने गहरे , मानवीय और सभ्य भावों से और कितनी कोमल , लगभग स्त्रियोचित मृदुता से भरा था । यह वह गुलाम किसान था जिसे अपनी आज़ादी का न कोई ख़्याल था , न उसकी कोई उम्मीद थी । क्या यही वह चीज़ नहीं थी जब कौंस्टैंटिन अक्साकोव ने हमारे देश के कृषकों में मौजूद उच्च कोटि की शिष्टता और सभ्यता की बात की थी ?
                  और जब मैं अपने बिस्तर से उतरा और मैंने अपने चारो ओर देखा तो मुझे याद है , मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मैं इन दुखी ग़ुलामों को बिल्कुल अलग क़िस्म की निगाहों से देख सकता हूँ । जैसे अचानक किसी चमत्कार की वजह से मेरे भीतर मौजूद सारी घृणा और क्रोध पूरी तरह ग़ायब हो गए थे । चलते हुए मैं मिलने वाले लोगों के चेहरे देखता रहा । वह किसान जिसने दाढ़ी बना रखी है , जिसके चेहरे पर अपराधी होने का निशान दाग दिया गया है , जो नशे में धुत्त कर्कश आवाज़ में गाना गा रहा है , वह वही मारेय हो सकता है । मैं उसके हृदय में झाँक कर नहीं देख सकता ।
                उस शाम मैं एम. से दोबारा मिला । बेचारा ! उसकी स्मृतियों और उसके विचारों में रूसी किसानों के प्रति अच्छे भाव नहीं थे । हाँ , पोलैंड के बंदियों को मुझसे कहीं ज़्यादा कटुता का बोझ उठाना पड़ रहा था ।



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प्रेषकः सुशांत सुप्रिय
          A-5001 ,
          गौड़ ग्रीन सिटी ,
          वैभव खंड ,
          इंदिरापुरम ,
          ग़ाज़ियाबाद - 201014
          ( उ. प्र. )
मो : 8512070086
ई-मेल : sushant1968@gmail.com



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