4
Advertisement

कुछ नही

जीवन थम सा गया है वक़्त की तरह,
वक़्त? ये तो रफ्तार है,
जी हाँ
जीवन ऐसी ही रफ्तार में है
बस  सांसे चलती जा रही है,
अलसाये से
थके हुए
निरर्थक
एक तारतम्य में
बीतते ही जा रहे है,
जीवन के पल,
उत्साह
उमंग
साहस
सब दूर हो गए हैं,
एक ही धुन में सुईयों से चलते हुए
हर एक कि पसंद को
अपनी पसंद बनाने में,
रोज वही घर
उस घर को करीने से सजाने में,
सुबह की पूजा शाम की आरती
आज तक नही समझी
सवारी हूँ या सारथी,
और तुम कहते हो
कुछ करती ही नही,
सच तो ये है
करती तो हूँ बहुत कुछ
या शायद
सब कुछ,
मगर उसे मैंने नियति
और समाज ने कर्तव्य
समझ लिया है,
और
परिवार ने समझा
कुछ नही...




रचनाकार परिचय 
श्रद्धा मिश्रा
शिक्षा-जे०आर०एफ(हिंदी साहित्य)
वर्तमान-डिग्री कॉलेज में कार्यरत
पता-शान्तिपुरम,फाफामऊ, इलाहाबाद

एक टिप्पणी भेजें

  1. आप की कविता में आज के समाज में स्त्री की क्या स्थिति है और क्या समाज सोचता है स्त्री के प्रति आपने अपने कविता के माध्यम से समाज को बताने का प्रयास किया है ।
    आपने बहुत अच्छी कविता लिखने का प्रयास की है ।
    आपको बहुत बहुत बधाई!

    उत्तर देंहटाएं

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top