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कुछ मोल चुकाना होगा 

जो सोचा है कब पाया है
मनुज को जीवन कब भाया है ?
दुख का दरिया दिखे दूर तक
मोल चुकाना होगा
खुशियों का पल कब आया है ?
समय शिला पर अहम भाव खो
शीश झुकाना होगा ...
लहरों का लुफ़्त उठाने हित
कुछ मोल  चुकाना होगा  ।। कुछ मोल चुकाना होगा ।।
जग सारा एक मंच बना
हम मंचन कब कर पाए ?
अपने भीतर पात्र छुपा है
ये चिंतन कब कर पाए ?
ये जीवन तो अभिनयशाला
कुछ खेल दिखाना होगा ...
अंतस का बाहर से
हमें मेल मिलाना होगा ।। कुछ मोल चुकाना होगा ।।
काँटों का बिखराव देख कर
क्या राहें बदली जाती है ?
चन्द अड़चनों से भिड़ने को
क्या बाँहें बदली जाती है ?
बाधाएँ श्रृगांर राह का
 “मनु” इनको अपनाना होगा ......
भीतर एक फौलाद जगाकर
मनोज कुमार सामरिया “मनु”
खुद को टकराना होगा ।। कुछ मोल चुकाना होगा ।।
अमृत सम जीवन को क्या
हम घूँट - घूँट  पी पाए हैं ?
इस जीवन में जो जीवन है
उस जीवन को जी पाए हैं ?
अपने में खोए जीवन को
हमें फिर से पाना होगा ....
देव रूप हम इस धरती के
ये भाव तो लाना होगा ।। कुछ मोल चुकाना होगा ।।
मृतप्राय: अंतस के तल  में
इक प्राण जगाना होगा ....
हृदयघाट पर तल के दल में
तम को भगाना होगा ...
मन की चौखट पर “मनु”
एक दीप सजाना होगा ।। कुछ मोल चुकाना होगा ।।
               


यह रचना मनोज कुमार सामरिया “मनु” जी द्वारा लिखी गयी है।  आप, गत सात वर्ष से हिन्दी साहित्य शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं। अनेक बार मंच संचालक के रूप में सराहनीय कार्य किया । लगातार कविता लेखन,सामाजिक सरोकारों से जुड़े लेख ,वीर रस एंव श्रृंगार रस प्रधान रचनाओं का लेखन करते हैं।  वर्तमान में रचनाकार डॉट कॉम पर रचनाएँ प्रकाशित एवं  कविता स्तंभ ,मातृभाषा .कॉम पर भी रचना प्रकाशित ,दिल्ली की शैक्षिक पत्रिका मधु संबोध में भी प्रकाशन हो चुका है।
संपर्क सूत्र :- प्लाट नं. A-27  लक्ष्मी नगर 4th ,
२००फिट बायपास के पास ,वार्ड नं. २
मुरलीपुरा जयपुर ।. पिन नं. 302039
व्हाटअप नं.  8058936129

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