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दो जिन्दा लाशें 

रात के करीब 2 बज गये, इंतज़ार उसके फोन का अब भी ! कानों मे घंटी सी बजती है हर 5 मिनट मे कि उसका फोन आया है ! रोने को दिल चाहता है, जार जार बिखरने की नौबत आ गयी है ! जिसको खुदा समझ लिया उस बे दर्द को दर्द देने का समय है लेकिन तन्हाई का घूंट पीते उस शक्स के लिये वक्त नहीं जिसको बार बार बोलकर अपनी तरफ़ खीचां कि
तुम जान हो, तुम्हारे बिना नहीं रह सकती ! प्लीज मुझसे दूर मत जाना, आई मिस यू जान !"
आज धूप मे डाले गये गहरे रंग के कपडे का बेरंगा होना समझ आ रहा है ! जब जार जार बिखरे तब फरेब समझ आ रहा है ! प्यार मे तो ना थी कोई कमी फ़िर क्युं ये सितम हुआ, वो हमदर्द इतना खुदगर्ज क्युं हुआ ? रहता साथ हर पल तो शायद सम्भल जाते हम, रातो की नींद छीन वो चैन से सो रहा !
ना जाने कितना दर्द और तन्हाई लिये जी रहे थे दोनों ! खोया दोनों ने ही था लेकिन जो तड़प सोनू के हिस्से आयी वो उसे तोड़ कर फेकने के लिये काफ़ी थी ! ऐसा भी नहीं था कि नीतू खुश थी वो भी बेहद गहरे ग़मगीन सागर मे नाव की तरह बिना पतवार के बह रही थी ! आंखो के नीचे काले गडढे, आंखे धसि हुई सूखे बेज़ार होंठ और बीमारों सी हालत !
दूसरी ओर सोनू ने शराब को साथी बनाया जब दर्द हद से गुजरने लगा तो पी लेने मे उसे कोई बुराई नजर नहीं आती थी ! बनावटी हसि लिये चेहरे पर घूमता रहता ! दोनों ही अपने काम में व्यस्त हो गये, और जिन्द्गी खुशी सारी अस्त-व्यस्त ! रोज़ अच्छी बुरी किसी ना किसी बात को याद करके आन्सू बहाना भी एक आदत में शुमार हो गया जब तक रोये नहीं तब तक चैन नहीं ! ऐसी ही कई बाते थी, लेकिन पिछली दफा जब
आधी रात को जब नीतू से बात हुई सोनू की तो अतीत की यादो ने उसे घेर लिया ! उसने खुद को बहुत सम्भाला लेकिन समझा नहीं पाया खुद को ! वापिस से नीतू को फोन नहीं करना चाहता था वह ! नींद की गोली खाने को वो पुरानी अलमारी खोलता है तो उसे नीतू की दी हुई डायरी हाथ लगती है जिसके कई पन्नो मे दोनों की तस्वीर लगी हुई थी ! ना जाने क्या हुआ और वो रात 3 बजे पुराने किस्से लिखने बैठता है, वो आज हर वो बात लिख देना चाहता है जो उसके दिमाग मे थी... कहानी 
शीर्षक डालता है-
अतीत का एक दौर
वो एक दौर ही था जब सोनू और नीतू एक दूसरे से बेपनाह मोहब्वत करते थे, एक दूसरे से बात किये बिना ना दिन होता था ना रात ! रोज़ दिन मे 2-3 बार फोन पर बात होना साधारण बात हो गयी थी ! आज यादे इतनी दिलचप्स हैं कि सोचने बैठो तो समय का पता ही नहीं चलता !
कल ही की बात हो जेसे नीतू को बस वाले ने चौराहे पर उतार दिया ये बोलकर कि बस- स्टैंड तक नहीं जायेगी बस ! जबकी कन्डकटर ने बोला था कि बस स्टैंड तक जायेगी ! गुससे से भरी नीतू ने बस वाले को सुनाया फ़िर पैदल टेक्सी स्टैंड की ओर जाते हुए सोनू को फोन किया और फ़िर बस वाले को गालिया दे डाली !
सोनू - बहुत हसा बोला तो अब पैदल आ रही हो, होते ही है कुछ बसवाले ऐसे !
नीतू- वो साला हरामखोर, बोला था मैने की बस स्टैंड जाना है, कमीना कही का ! बोलता है कि मैने समझा यही तक का बोली साला चू...
बीच मे रोकते हुए सोनू बोला,
अरे बस बस, लोग सुनेगे तो क्या बोलेगे कि लड़की देखो कितनी गाली देती है, थोडा तो शर्म करो, घर आकर देना गालिया मे सब सुनुगा !
नीतू- सुन रहे हैं तो सुनले, उस बस वाले का खून कर दुगी मे ! पहले भी 2-3 बार हो चुका है ऐसा, पेसे पूरे लेगे और छोड़गे आधे रास्ते ! हरामखोर साले !
सोनू- ओके ओके, अब कल मिले तो पकड़के सुना लेना ! खूब गाली दे लेना !
नीतू= जरुरी थोडे ही है, कि कल यही बस मिले मुझे आने को ! लेकिन मिलेगा तो छोडुगी नहीं !
सोनू- ठीक है ना मिले वो तो मुझे सुना लेना ! टेक्सी मिल गयी घर लौटने को या नहीं ! और तुम जायदा गुस्सा नहीं करो, गर्मी बहुत है घर पहुचो फ़िर खाना पीना खाओ थोडा आराम करो फ़िर बात करेगे ओके ! टेक केयर !
ऐसी ही छोटी छोटी बाते, सोनू-नीतू को बेस्ट फ्रेंड बनाने मे कामयाब रही ! अभी कुछ समय पहले की ही बात लगती है जब...
दोनों रात को 1-2 बजे तक अपने अपने कमरे के किसी कोने मे बैठकर फोन पर बात करते थे ! बाते भी आई लव यू जानू, मिस यू माय लव...
ऐसी बिल्कुल भी नहीं होती थी ! आप सोच रहे होगे प्यार करते थे वो दोनों, लेकिन जबके ये किस्से हैं ये जब वह बेस्ट फ्रेंड हुआ करते थे !
तो फोन पर प्यार मोहब्बत की बाते नहीं होती थी बल्कि दुनिया भर की बाते होती थी ! कभी सोनू अपनी, कभी परिवार, दोस्तो की बाते करता था, ऐसे ही नीतू भी !
नीतू के लिये ये जानना बहुत जरुरी रहता था रोज़ कि सोनू ने आज क्या खाया, तबियत ठीक है कि नहीं, किसी से झगडा तो नहीं हुआ, कोई बात बुरी तो नहीं लगी ? रोज़ फोन रखने से पहले सोनू को इन सवालो के जबाब देना जरुरी था ! क्युकिं सोनू को गुस्सा बहुत जल्दी आता था, दिल का वो साफ़ था लेकिन अक्सर उसके दोस्त उसकी अच्छाई का फ़ायदा उठाते थे ! काम निकल गया तो सोनू से कोइ मतलब ही नहीं था उसके मतलबि दोस्तो को !
सोनू जेसा था अब वेसा नहीं था नीतू के साथ ने उसे बदल दिया था ! नीतू उमर मे सोनू से बडी और समझदार थी, अपने काम, दोस्तो, घर को लेकर जो भी फैसले सोनू को लेने होते थे वो नीतू से पूछे वगेर कभी नहीं लेता था ! और नीतू कभी उसे गलत राय नहीं देती थी ! वो जानती थी कि सोनू के दिल और दिमाग को केसे समझाना है और खुद भी अपनी एक छोटी से छोटी बात भी सोनू को बता देती थी, सोचकर भी कि ये बात सोनू को नहीं बतानी है तब भी 2-3 दिन बाद खुद ही बोल देती थी !
ऐसी ही छोटी बाते, जो असल मे किसी रिश्ते को सम्भाले रखती हैं, उनका दोनों बहुत खयाल रखते थे ! अक्सर नीतू से गलती होती थी, ऐसा दोनों ही मानते थे, किसी दिन यदि लडाई हो गयी तो दोपहर को काम से फ़ुर्सत मिलते ही नीतू सोनू को फोन तब तक करती थी जब तक वो फोन ना उठा ले, कभी कभी तो 10 -20 फोन हो जाने के बाद सोनू फोन उठाता था और चिल्लाना शुरू, जायदा नाटक करने की जरुरत नहीं है, तुमने मुझे टाइमपास समझ के रखा है, अपनी फैमली को दो सारा टाइम यहा क्युं फोन की ! फोन नहीं करना अब समझी !"
चुपचाप नीतू सुनती रहती बस इतना ही बोलती तुम्हे बुरा लगा ना तो सुना लो ! जितना गुस्सा करना है करलो लेकिन फोन उठा लिया करो ! बोलो जो भी बोलना है !
सोनू- फोन रखो, दिमाग खराब मत करो मेरा !
नीतू= बोलो जो भी बोलना है, मे अपनी परेशानी नहीं सुना रही हु !
सोनू फोन काट देता हमेशा ऐसे ही होता था ! दिनभर रात को नीतू फोन लगातार लगाती लेकिन सोनू फोन नहीं उठाता ! आधी रात को जब उसकी बैचेनी बड़ती नींद नहीं आती तो नीतू को फोन लगाता वर्ना 2-3 दिन ऐसे ही चलने देता फ़िर उसके बाद आधी रात को फोन और दोनों फोन पर रो रहे, एक दूसरे के वगैर रहते नहीं आता था दोनों को और आज दोनों जी रहे हैं दुनिया की नजर मे, लेकिन कोई नहीं जानता ये जिन्दा लाशे हैं !
अलग हुए पूरे २ महीने हो चुके थे ......
अलग हुए या साथ थे, ये दोनों बाते किसी तीसरे को पता ना थी, इसीलिये जो भी हुआ दोनों के बीच हुआ था ! इन २ महीनों में नीतू ने अपना सबकुछ दांव लगा दिया सोनू को मनाने में, उसने लगातार दिन में 2-3 बार फोन किये कि सोनू इस बार उसे माफ़ करदे, अगली बार से वो जायदा से जायदा समय उसे देगी ! काफ़ी दिनों तक सोनू ने फोन नहीं उठाया, क्युकिं वो जानता था जितनी तकलीफ़ उसे हो रही है उससे कहीं जायदा नीतू को है, और अगर उसने फोन उठाया तो वो अपने आप को रोक नहीं पायेगा नीतू के पास लौटने से !
समय गुजरता जा रहा था और दोनों जिन्दादिल इंसान सूखे पत्तों की तरह मुरझा रहे थे, दोनों एक दूसरे के बिना नहीं जी सकते ये वो दोनों ही जानते थे पर नीतू के परिवार की सोचकर दोनों एक दूसरे को अपना नहीं पा रहे थे ! जेसे तेसे दिन गुजर जाता लेकिन रात दोनों रोते निकलती, हालाकि जब साथ थे तब भी कभी रात 11 बजे के बाद बात नहीं करते थे लेकिन अब तन्हाई, घुटन, दर्द और अकेलापन सोने नहीं देता था !
लेकिन नीतू ने हार नहीं मानी थी वो रोज़ की तरह सोनू को फोन करती थी कि एक दिन वो उस पर दया खाकर उसकी बात को समझेगा, और एक रात करीब 1 महीने बाद... नीतू ने रात को 1:30 पर सोनू को फोन लगाया, सोनू उस समय नीतू के खयालों में ही बेसुध पडा था अब तो उसने सिगरेट और कभी कभी शराब पीनी शुरू कर दी थी !
अचानक से आधी रात को नीतू का फोन आया देखा तो थोडी खुद की सुध ली, और सोचने लगा कि इतनी रात को फोन पक्का नीतू सो नहीं पा रही होगी पता नहीं केसी होगी, मुरझा गयी होगी मेरे बिना, परेशानी में तो नहीं है किसी?
जब लगातार फोन आता रहा तो घबराकर सोनू ने फोन उठाया...
- हेलो... हा कौन
= मेरा नंबर भी डीलीट कर दिया, वाह
- कौन हो आप? मे पहचाना नहीं.
= अब तुम मुझे पहचानोगे भी केसे, मैं लगती कौन हुं तुम्हारी ?
- देखिये आपने गलत जगह फोन किया है...
= सौरी गलती से लग गया, में तो अपने किसी दोस्त को फोन लगा रही थी !
और
फोन कट गया! लगा जेसे बहुत कुछ टूट गया हो अंदर... नीतू रोती रही, वो दर्द जो अब असहनीय हो गया था! और वहा सोनू भी कहा खुश था वो भी तो रोया था ! करीब आधे घंटे बाद खुद सोनू ने फोन किया...
- हेलो नीतू... केसि हो? ठीक तो हो ना, इतनी रातगये फोन क्युं किया, क्या हुआ?
= बस ऐसे ही, कोई खास वज्ह नहीं थी... तुमसे बात करने का मन किया तो बस... खुद को सम्भाल्ते हुए नीतू बोली !
- अच्छा, वेसे खुश तो बहुत होगी तुम, तुम्हारे रास्ते का कांटा निकल ग्या, अब चैन से अपने पति के साथ ऐश करो ! ना बार बार किसी को फोन करना, ना किसी की बाते सुन्ना कि फोन क्युं नहीं करती, समय नहीं है वगेरह वगेरह... क्युं हो ना खुश अब ?
सोनू ने ये सवाल नहीं किया था बल्कि खींच कर जोरदार तमाचा मारा था नीतू की भावनाओ को ! नीतू थोडा चुप रही फ़िर बोली -
सही कह रहे हो तुम, तुमने जो फ़ैसला लिया वो बहुत अच्छा है ! तुम इतना मुझे समझते हो उसके लिये थैंक यू !
= तुम बताओ केसे हो, क्या चल रहा है जिन्द्गी में ? मेरी तरह तुम भी खुश होगे, कि चलो सिर दर्द तो दूर गया, अब ना बार बार फोन करना ना ही किसी को सम्भाल्ना !
- खुश... हा बहुत हुं ! तुमने इतना डसा मुझे कि दूर जाकर खुश होना तो बनता ही है ! तुम भी तो खुश हो तो मैं पागल थोडे हुं जो बैठा रोऊगा !
= मैने कब कहा तुम पागल हो तुम नहीं हो पागल, ना ही बेवकूफ़, तुम बहुत ही अच्छे हो ! तभी शायद में तुम्हे भूल नहीं पाउगी कभी !
- वेसे तुम्हारे पति को पता है कि आधी रात को तुम किसे डस रही हो मतलब किससे बात कर रही हो ?
= नहीं ! वो सो रहे हैं, बोल रहे थे कि सोनू का फोन नहीं आया क्या हुआ, तुम दोनों दोस्तो की बात नहीं हो रही क्या ?
- क्या बात है, उसको पता है कि काफ़ी दिनों से बात नहीं की मैने वाह ! तुम क्या बोली?
= बोल दिया उसके पास समय नहीं है ! बहुत बिज़ी है वो !
- और वो पागल मान गया ! सोनू हसते हुए बोला!
= तुम कभी किसी को भी सही नहीं समझ सकते क्या ! वो जानते हैं तुम मेरे अच्छे दोस्त हो आज तक मैने कभी उनको नहीं टोका जिससे बात करना है करे तो वो मुझे क्युं रोकेगे में चाहे जिससे बात करुं ! नीतू ने आक्रामक होकर कहा ! लोगों को जज करना बंद करो सोनू !
- हस्ते हुए सोनू बोला, मेरा मन मैं जो चाहू जेसे चाहू समझू, तुम्हे क्या ?
= कभी खुश नहीं रह पाओगे ऐसे, कम से कम समझने की कोशिश तो करो कभी ! हर बार मुझे अपने प्यार का सबूत देना पड़ता है ! कितने बार बोलू कि ही पहले और अखिरी इंसान हो जिससे मैने प्यार किया है ! एक वो है जिन्हे जरुरत हुई तो जरुरत पूरी की और कोई मतलब नहीं हां जिम्मेदारी सारी निभाते हैं पति की और एक तुम हो जो किसी बात को समझना ही नहीं चाहते, ये जानते हुए कि तुम्हारे बिना मेरा हाल बुरा हो जाता है, इसके बाद भी 1 महीने निकाल दीये तुमने क्युं ?
जयति जैन
जयति जैन
तुम तो मुझसे बहुत प्यार करते थे ना, ऐसा प्यार था तुम्हारा तुमने ये नहीं सोचा कि केसे मैं अकेले रहूगी, कौन होगा मुझे समझने वाला, किसको अपना दर्द सुनाऊगी कौन समझेगा ! तुम भी औरो की तरह निकले एक के पास समय नहीं, काम से फ़ुर्सत हुए तो फोन ओर टी.वी. और सो जाओ और एक तुम जिसकी जिन्द्गी हुआ करती थी मैं, कभी समझने की जरा भी कोशिश की तुमने कभी कि वो केसी मुसीबत में है जो फोन नहीं कर पा रही ! जानते हो पिछले 1 महीने से में B.P. की गोलिया खा रही हुं, खुश हुं ना बहुत इसीलिये !
मैने तो कई बार बोला, सब छोड़ कर आउगी तो अपनाओगे मुझे, तो तुममे हिम्मत नहीं है ! अभी मेरे परिवार का खयाल है, कल को अपने परिवार का होगा या नहीं ! और हां एक वादा करती हुं तुमसे तुम शादी करके अच्छे से सेट हो जाओ, तुम्हारी जिन्द्गी से मैं हमेशा के लिये दूर हो जाऊगी ! कभी फोन नहीं करूगी कम से कम तसल्ली तो रहेगी तुम्हारा ध्यान रखने वाला है कोई ! आज़ाद कर दुगी मैं तुम्हे हमेशा के लिये !
अरे मेरी ना सही अपनी ही भावनाओं का खयाल रखो, तुम खुश हो इन सबसे और झूठ बोलना मत ! मैं तुम्हे तुमसे जायदा जानती हुं, नहीं हो तुम खुश ये नाटक बंद करो ! खुद को तकलीफ़ देना बंद करो, तुम्हे जो कहना है सुनाना है सुना लो, अंदर ही अंदर मत घुटो ! मेरी देख रेख के लिये बहुत है लेकिन तुम अकेले हो ! केसे करोगे सब अकेले सामान्य ? देखो बहुत हुआ अब मैं माफ़ी मांग रही हुं ना ! सौरी
हाथ जोड़के, पैर पकड़कर माफ़ी मांग रही हुं, तुम्हे अब भी मेरे साथ नहीं रहना है मत रहो लेकिन खुद को सम्भालो, खुद तो खुश रहो !
अब बोलोगे कुछ...
सोनू निशब्द था !!!
बात करीब साढे चार साल पहले की है, सोनू अकेला पर खुश था, और नीतू शादीशुदा...
जब नीतू सोनू की जिंदगी में आयी तब वो किसी और की हो चुकी थी, सोनू नीतू से उमर में 6 साल छोटा था ! दोनों बस दोस्त बने, दर्द को बांटने वाले दोस्त... एक दूसरे की केयर करने वाले ! पर पता ही नहीं चला कब प्यार करने लगे ! मन से दोनों एक हो गये कभी गलत नहीं सोचा एक दूसरे के बारे में... मन मिले और कब तन मिल गये पता ही नहीं चला ! जबकि दोनों साल भर में एक बार ही मिलते थे, लेकिन फोन पर बात अक्सर हो जाती थी मतलब रोज़ दिन मे 2 बार ...
नीतू भी अपनी शादी से खुश नहीं थी क्युकिं उसके कृष्ण कन्हेया की कई गोपिया थी... ना उसे कभी वो प्यार मिला ना अपनापन ! जब वो मां बनी तो उसके पति और उसके बीच कुछ सही हुआ और अब काफ़ी अच्छा था दोनों के बीच ! पर प्यार की कमी बनी रही... जब दोनों मिले तब नीतू की 2 साल की बेटी थी ! नीतू मानती थी कि उसकी जिन्द्गी की सारी खुशियां सोनू के साथ और प्यार के सहारे ही मिली हैं ! पर हाल ये थे कि दोनों ही ना इक दूसरे को अपना पा रहे थे ना छोड़ पा रहे थे ! और सोनू जिसके लिये प्यार कभी सिर्फ बकवास और फ़ालतू की चीज रहा पर उससे दोस्ती करने के बाद प्यार को महसूस किया !
लेकिन, सोनू ने एक ऐसे इंसान से प्यार किया, एक ऐसे इंसान को सबकुछ समझा, जो सोनू का कभी था ही नहीं, जिस्पे हक ही नहीं था कभी " बल्कि सोनू उसकी जिन्द्गी में दूसरा बनके आया कि उसकी जिन्द्गी 2 जगह बंट गयी -
प्यार और जिम्मेदारी !
आज नीतू अपने पति की थी भी और नहीं भी लेकिन सोनू की नहीं थी ! सोनू बोले मेरे साथ रूक जाओ कुछ समय, तो सोचना पड़ता था क्युकिं रिश्ता छुपा हुआ था ! डर था किसी के सामने ना सच खुल जाये कि दोनों एक दूसरे को चाहते हैं ! किसी को बता नहीं सकते थे ! लेकिन सोनू की तो हर तरफ़ से हार थी, ना वो नीतू अपनी कह सकता था , ना उसका बन के रह सकता था ! ना उससे कुछ कहने का अधिकार था, ना उसपे कोई अधिकार था ! फ़िर नीतू के पास समय बहुत कम रहता था सोनू के लिये, अपने पति के साथ वक्त गुजारने के कारण एक दिन नीतू के पास बिल्कुल समय नहीं था सोनू के लिये... तब सोनू ने सोचा कि रोज़ ऐसा ही होता है नीतू के पास उसे छोड़ कर सबके लिये समय है, सच जानते हुए भी
" क्युं मेनें उसे अधिकार देकर रखे हैं, खुद पे... दिल पे... दिमाग पे ???
अगर कभी वो मुझे मिलती भी है अकेली तब ही वो मेरी बनकर रहती है ! बाकी तो मुझे उम्मीद भी नहीं है उससे, लेकिन खुद पे यकीन नहीं आता कि मेने क्या किया खुद के साथ, उस इंसान को अपना सब कुछ माना जिसके लिये में कभी सबकुछ नहीं हो सका था, जानता था और आज भी मानता हुं कि गलत इंसान से प्यार किया है जो मेरा कभी नहीं था ! उसने भी प्यार किया लेकिन आखिरी में, मैं किसी का पहला प्यार बनना चाहता था, लेकिन मेरा ही पहला प्यार मेरा नहीं हुआ ! मेनें प्यार किया था बिना शर्त और निश्वार्थ के, लेकिन हालातों और जरूरतों ने मुझे स्वार्थी बना दिया है ! और अब मुझे .....
मैं कभी ऐसा नहीं था जेसा में आज हुं, मैं ऐसे इंसान के साथ शारीरिक रूप से एक हुआ/जुडा... जिसके शरीर पर किसी और का हक था/है लेकिन मेरे शरीर और दिल पर जिसने हक जमाया और मेने ज़माने भी दिया, दुख मुझे इस बात का नहीं है ! दुख इस बात का है कि सच सामने होते हुए भी मेने उस सच को क्युं नहीं समझा ! लेकिन अब क्या करुं, केसे मान्गू अपने प्यार का हक ? उसका साथ... अलग हो जाऊ तो कुछ दिन परेशानी फ़िर आदत बन जायेगी लेकिन वही परेशानी झेल्ने की हिम्मत कहा से लाऊ !
नहीं जानता उसने मेरी जिन्द्गी तबाह की या मेने उसकी... लेकिन वो कहती है कि जबसे तुम मेरी जिन्द्गी में आये हो मेने जीना सिखा है, मुस्कुराना सीखा है ! तुम्हारे साथ रहना मुझे बहुत भाता है, तुम्हारे गले लगना, गोदी में सिर रखकर सोना सब बहुत प्यारा है ! और में चाहता हुं कि जब हम तन मन से जुड़ ही गये हैं तो एक हो जाये ! क्युकी इस तरह तीन लोगों की जिन्द्गी बर्बाद हो रही है ! "
लंबा-चौडा सोचने बाद जब फोन की घंटी बज़ी तो विचारो की श्रंखला टूटी और तुरंत ही फोन उठाया..." सौरी जान, बहुत कोशिश की लेकिन ये यहीं थे तो फोन ना कर सकी !" जेसे ही इतने शब्द सोनू के कानों में पडे तो गुस्से को दिल में दबाकर बोला - मैं भी बिजी था, अभी फ्री हुआ हुं , कोई बात नहीं ! वक्त गुजरा और अक्सर समय को लेकर दोनों के बीच झगडे बड़ने लगे, नीतू को अपने पति को समय देना पड़ता था और सोनू को भी ! सोनू को नीतू चाहिये थी और नीतू को पति-बच्चे, परिवार और सोनू सब कुछ ! और
एक दिन 5 साल पुरानी दोस्ती जो अब बेबुनियाद और बेनाम रिश्ते को समेटे थी वो टूट गयी ! और रिश्ते के साथ साथ दो संगदिल इन्सानों को तोड़ गयी ! जीने और मुस्कुराने की सारी वज्ह अब दोनों के लिये खतम हो गयी थी ! सोनू से कहीं जायदा कुछ नीतू की जिन्द्गी से गया था, खत्म हुआ था लेकिन मिला भी नीतू को ही बहुत कुछ सिवाय एक ऐसे इंसान के जो सिर्फ उसी का हुआ करता था ! 
दुख मनाऊ तो कितनी बातों का और किस बात का - अक्सर सोनू यही सोचता था !


लेखिका- जयति जैन (नूतन) 'शानू'....... रानीपुर झांसी

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