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मछलियाँ



मछलियाँ अनगिनत तैर रहीं है जल में
उसी एक जल में इधर से उधर घूमती हुई
दाने खाने में लगी हुई,
जैसे औरतें टहलती है एक ही घर मे,
दाने पानी के इंतजाम में लगी हुई।
एक औरत दूसरी लड़की को
औरत बनते ही दे देती है
वो सब ज्ञान जो उसने पाया है।
किसी और औरत से औरत बनने के लिए,
ये ठीक वैसा ही नही लगता जैसे
निगल जाती है
बड़ी मछली छोटी मछली को।।


रचनाकार परिचय 
श्रद्धा मिश्रा
शिक्षा-जे०आर०एफ(हिंदी साहित्य)
वर्तमान-डिग्री कॉलेज में कार्यरत
पता-शान्तिपुरम,फाफामऊ, इलाहाबाद

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