0
Advertisement

अनुभव - एक आत्मशक्ति

जीवन का प्रत्येक बढ़ता कदम हमेशा कोई न कोई सीख छोड़ जाता है, अच्छा वक़्त होता है तब भी और बुरा वक़्त होता है तब भी।
ये तो इंसान की अपनी आत्म क्षमता  होती है कि वो उसे किस रूप में स्वीकारता हैं ।
ये तब की बात है जब हम आठवी कक्षा में पढ़ा करते थे, हम बहुत ही डरपोक और शर्मीले से हुआ करते थे ,आजकल के बच्चों की तरह नही,और टीचर के सामने तो नजरे उठा ही नही पाते थे,
क्लास में तीन चार मॉनिटर थी और उनके लगभग पूरे साल ट्यूशंस चलते ही रहते थे,और हम कभी ट्यूशन गये ही नही।वो क्लास के होशियार बच्चो में गिनी जाती थी।
एक बार साइंस के टीचर ने टेस्ट लिया और वो कॉपी चेक करने के बाद क्लास में आये टेस्ट पेपर्स के साथ ,और एक एक करके सबके टेस्ट पेपर वापस कर दिए ।क्लास में किसी के भी नम्बर तीन से ज्यादा नही आये,और हमारा दिल था कि बैठा जा रहा था, हम मन ही मन सोच रहे थे जब इनकी ये हालत ये हैं तो बस आज हमारी शामत आने वाली है।
और सबसे बाद में जो रोल न. बोला गया वो हमारा ही था ,सर ने पूछा नकल की ,हमने बोला नही।
और वास्तविकता भी यही थी हमे नकल करने की बीमारी थी ही नही।
खैर जो प्रश्न थे हमसे फिर सॉल्व कराए गए इससे पहले ऐसा कभी नही हुआ था
उस टेस्ट में हमारे टेन ऑफ़ टेन आये थे।उस पल को हम आज तक भी नही भूल पाए हैं वो हमारे आत्म विश्वास की पहली सीढ़ी थी ।
ये हमारे जीवन का वो लम्हा था जिसने हमे बताया था कि हम भी अपनी पहचान रखते है।
---------------–-----------–----------------------------
9 वीं क्लास के प्रवेश एग्जाम चल रहे थे  इंग्लिश और मैथ के टेस्ट लिए जा रहे थे, और हम दोनों में ही जीरो थे
रूबी श्रीमाली
रूबी श्रीमाली
उस स्टेटस के हिसाब से।
एक नई टीचर आई थी उनका नाम था अनुपमा
थोड़ी खड़ूस सी थी वो इंग्लिश का टेस्ट ले रही थी।
टेस्ट देकर भी हम क्या कर लेते ।दिया तो था पर परिणाम तो मालूम था ही हमे।
बस फिर टीचर बोली कैसे कवर करोगे तुमसे नही होगा संस्कृत लो।इंग्लिश नही मिलेगी।
उस पल जाने क्या फितूर था कि नही मैडम इंग्लिश ही लेनी है 
और टीचर लेकर चली गई हमे प्रिंसिपल के ऑफिस ।प्रिंसिपल टीचर ने बोला मत लो इंग्लिश फैल हो जाओगे।
तब भी हम बस अपनी ही जिद पकड़े बैठे थे।जबकि हम टीचर के सामने कभी बोले नही थे ,उस रोज न जाने क्या हो गया था।फिर हमसे लिखवाया गया यदि तुम बोर्ड एग्जाम में फैल होते हो तो ये तुम्हारी जिम्मेदारी होगी,हमारी नही।
और फिर क्या था अनुपमा मेडम तो हाथ धोकर हमारे पीछे ही पड़ गई।बस उन्हें हम ही याद रहते थे, कुछ पढ़ाया तो और किसी से नही जानना है कि किसी को समझ आया या नही,लेकिन हमसे जानना है और तभी दोबारा रिवाइज करना है ।डर भी लगता था पर आत्मसम्मान पर बन आई थी।पीछे भी नही हट सकते थे।
हमने घरवालो से बोला ट्यूशन करा दो बोले नही
नही तो नही क्या कर सकते थे ।हमारी एक फ्रेंड थी उसने ट्यूशन लगाया ।सिखने की इतनी लग्न थी उस पल कि कहि अनुपमा मैडम बेज्जती न कर दे, उन्हें पूरी क्लाश में हमारे अलावा जैसे कोई दिखाई ही नही देता था।तब हमने सोचा क्यों न इस नोटबुक को ही रट डालें।और हमारी मेहनत रंग लाई भी ।
अब अनुपमा मैडम हमे ढूंढती उससे पहले ही हम बोल देते थे मैडम हम बताये।
और अब वो सिर्फ हमे नही ढूंढती थी अब तो हम उन्हें ढूंढते थे।
अब तो वो हमें बोलने से पहले ही चुप कर दिया करती थी।
थैंक्स  तो अनुपमा मैडम अगर वो न होती तो शायद हम इतने कम समय में इतना सब कुछ नही सीख पाते।


यह रचना रूबी श्रीमाली जी द्वारा लिखी गयी है।आपने चौधरी चरण सिंह मेरठ यूनिवर्सिटी, से वाणिज्य में परास्नातक की उपाधि प्राप्त की है। आप साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखनी चलाती हैं।                                   

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top