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मेरी माँ

माँमाँ को ईश्वर से मिला है ममता का वरदान
सच पूछो तो माँ इंसान नहीं है भगवान
जब कभी मन होता बैचेन
माँ के सीने से लगकर मिलता है चैन
माँ ही है जो हमे बोलना सिखाती है
खुद थोडा सा खाकर रह जाती हमें भरपेट खिलाती है
माँ करती है अपने बच्चों के लिए दुआ भी जाती है
माँ के होते कोई मुसीबत ना हमको छू पाती है
रोज सुबह उठकर छूता हूँ मैं अपनी माँ के पाँव
कडी धूप में माँ करती है मेरे ऊपर छाँव
मेरी माँ सलामत रहे करता हूँ मैं यही मन्नत
दुनिया में सुख कहीं और नहीं माँ के पेरों में है जन्नत



यह रचना विशाल गर्ग जी द्वारा लिखी गयी है.आप खुर्जा, उत्तर प्रदेश से हैं .आपने एम् .कॉम तथा बी.एड तक शिक्षा प्राप्त की है तथा शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं .

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