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मुश्किलों से जूझते रहना क़लम

            
मुश्किलों  से जूझते  रहना क़लम।
हौंसलों की कहानी कहना क़लम।।
        है   विवशता  से  भरा  हर  आदमी।
        बोझ   कितना लिए है  सर आदमी।
बृज राज किशोर " राहगीर "
बृज राज किशोर " राहगीर "
        आज भी कुछ काम मिल पाया नहीं,
        टूटकर  चल  दिया  है  घर आदमी।
दर्द उसका भी ज़रा सहना क़लम।
मुश्किलों से  जूझते रहना क़लम।।
        रोटियाँ ही  चाहियें  मज़दूर को।
        पेट भरने  के  लिए  मज़बूर को।
        हर कहीं अवहेलना मिलती उसे,
        छेड़  मत देना किसी नासूर को।
प्यार की माला उसे पहना क़लम।
मुश्किलों  से जूझते रहना क़लम।।
        उम्र  बेटी की निकलती जा रही।
        बात शादी की नहीं बन पा रही।
        हाथ  में  पैसा  नहीं है क्या करे,
        बाप को चिन्ता यही है खा रही।
दे उसे इक आस का गहना क़लम।
मुश्किलों  से जूझते  रहना क़लम।।
        रूप कुछ  ऐसा सियासत ने धरा।
        सिर्फ़  अपना  पेट ही सबने भरा।
        लुट रही जनता सरे बाज़ार  जब,
        बोलना ही चाहिए खुलकर ज़रा।
धार  के  विपरीत  भी  बहना क़लम।
मुश्किलों की कहानी कहना क़लम।।


---रचयिता: बृज राज किशोर " राहगीर "
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पता: FT-10, ईशा अपार्टमेंट, रूड़की रोड, मेरठ-250001 (उ.प्र.)

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वरिष्ठ कवि, पचास वर्षों का लेखन, दो काव्य संग्रह प्रकाशित
विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और साझा काव्य संग्रहों में रचनायें प्रकाशित
अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ

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