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 एक और दिन 


दिनकर के अवसान पर मुस्काई पल भर
संझा रंग भरी;
अम्बर पर आती छलकाती नभ की बिंदिया
तारों की गगरी|

डूब गया सिन्धु में तेजमय दिवस पराजित|
राजहंस गुप्ता 
बिखर गयी चंदा की सारी चांदी अर्जित|
पहने तारों के हार चली करके श्रृंगार
विजित विभावरी|

पंछी सोये, तिमिर के श्यामंचल में खोये;
गेह पंथ तरु पुंज कुंज और पात भिगोये;
ओस गिराती  सजल  डूबती-उतराती
अम्बर की नगरी|

आये अमावस बादल बनकर छाये  पावस
हाथ न सूझे, रंग न बूझे, काली कालस ;
एक धरा-नभ, दिशा-निशा, सारे ही हतप्रभ
प्रहरों के प्रहरी|



 ईश्वर



मैं तृषा तुम नेह जलधि|

आत्मा आबद्ध  प्राण सिक्त
तुम बिन प्रारब्ध शिव से रिक्त
सर्वस्व के तुम केन्द्र-परिधि|

श्वांस में प्रवहन  ह्र्दय झंकार
दृष्टि में ज्योति  जगत श्रृंगार
जीवन-रज तुमसे निधि|

अस्मिता वंदन चेतन साधना
सहज संप्रेषण साक्ष्य भावना
संग अपरिमेय अवधि|



 दीपक



जल रहा दीपक अकेला
किस अजाने लोक में?
खोजता आराध्य अपना
बूँद भर आलोक में|

देखना चाहता है कुछ
 हर जोत का बलिदान कर;
बींधते हर बार दृग
आँगन विजन , सूनी डगर|
नित उन्डेले प्राण निज
 उनबुझ तिमिर के ओक में|

वर्तिका में नेह सम
 स्वयं को पीकर व्यथा
कांपते कर से लिखे
 निस्सीम पर धूमिल कथा;
झोंक में झोंका मिटाता
धुन रहा सिर शोक में!



 आत्मा



मैं किन नयनों का गीत सजल?

क्योंकर अपनी पीड़ा भूली? मैंने किसकी सीमा छूली?
मिटने को प्यासी धूलि में
मैं किस बादल की बूँद तरल?

निर्लज्ज निराशा रग-रग में, निस्सार कुहासा भर दृग में,
पग-पग पर शूल भरे जग में
मैं खोज रही क्यों राह सरल?

सिसकी थिरके स्वर लहरी पर; तपती मन भूम दुपहरी भर;
जन्मों से मेरी देहरी पर
पर्वत-सी बैठी पीर अचल|

करुणा से कैसी होढ़ रही? किस-किस से नाता जोड़ रही?
हर तट की ठोकर तोड़ रही,
किस उदधि की उर्मि उच्छल ?




 उड़ान



ऊँचे नील गगन के वासी, अनजाने पहन पाहुन मधुमासी,
बादल के संग जाने वाले,
पंछी रे, दो पर दे देना !

सीमाओं में बंदी हम, अधरों पीते पीड़ा का तम:
तुम उजियारे के पंथी, मेरी अंधियारी राह अगम!
बांहों पर मोती बिखराए, आँखों पर किरणे छितराए,
ऊषा के संग आने वाले
पंछी रे दो पर दे देना|

तुमसे तो बंधन अनजाने, तुम्हें कौन-से देस बिराने?
मैं बढूं जिधर उधर झेलूं  अवरोधक जाने पहचाने|
अधरों पर मधुबोल संजोये, पावनता में प्राण भिगोये,
मुक्ति-गान सुनाने वाले
पंछी रे दो पर दे देना!




 वेदना 



वेदना का एक सिन्धु और दे दे
जीवन, वेदना का एक सिन्धु और दे दे

देख मेरे प्राण अटके हैं अभी तक
मेरे सूखे कंठ में बनके कसक
मैं अभी डूबा नहीं आपादमस्तक
वेदना का एक सिन्धु और दे दे......

देख उभरी आ रहीं मेरी नसें
शेष हैं कुछ रक्त की बूँदें हंसें
और ज्यादा दर्द के फंदे कसें
वेदना का एक सिन्धु और दे दे...........


- राजहंस गुप्ता 

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  1. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति संवेदनाओं को जीवित करती मानव इच्छा ,विचारणीय !सुन्दर आभार "एकलव्य"

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