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प्रेम - एक कसक जिंदगी की

मैं ना जानू जग रीत कोई
बस तू अपना सा लागे।
सुनने में कितनी अच्छी लगती है न प्रीत की बाते,सब कुछ जैसे सुरमय सा होता है ,बिना किसी बात के ह्रदय प्रफुलित हो उठता है किसी की कोई बात सोचकर कभी पलके नम हो जाती है कभी होठो पर हँसी बिखेर जाते हैं।
प्रेम
ये नैनीताल की वादियां भी बड़ी अजीब है समझ ही नही आता है मिलन के गीत गाती हैं या विरह की गाथा सुनाती हैं,दूर दूर तक फैली ये खामोशिया एक अलग ही माहौल बनाती है।
आज फिर ये वादियां उसी का एहसास दिला रही है जिसे हम दुनिया की भीड़ में बहुत पीछे छोड़ आए हैं .दुनिया की इस भीड़ में कोई ऐसा भी होगा ये हमने कभी सोचा ही नही,गेहुआँ रंग घुघराले बाल और बड़ी बड़ी शरारती आँखे इतना तो वो खुद नही बोलता था जितना उसकी आंखें बोल जाती थी,
वैसे तो वो लन्दन का रहने वाला था किंतु उसमे विदेशी जैसा कुछ भी नही था उसका रहन सहन एकदम भारतीय था।
सब कजन्स छुटिया मनाने नैनीताल आये हुए थे और उनके साथ आया हुआ था वो सोबर सा लड़का,लडकिया तो बस उसके पास जाने का मौका ढूढ़ा करती थी जब देखो तितलियों की तरह उस पर मंडराती रहती है ,फिर गलती उनकी थी भी नही वो था ही एकदम सपनो के राजकुमार जैसा।एक हम ही थे जो उसके करीब जाने से कतराते थेएक अजीब सी उलझन घेरे रहती थी,और फिर हमें आदत भी नही थी दिल्लगी की हमे तो एकांत प्रिय था फिर भी कुछ था जो उसकी तरफ खिंचता था,
इतनी लड़कियों से घिरे होने के बाद भी जैसे उसकी निगाहे कुछ ढूढती सी रहती थी,हमारी नज़र जब भी उसकी तरफ जाती तो ऐसा लगता जैसे वो हमें ही देख रहा है, बड़ा अजीब एहसास था वो जहाँ वो कुछ भी न कहकर बहुत कुछ कह जाता था ,न जाने क्यों डर लगता था उसकी आँखों से झलकते जज्बातो से।ऐसा लगता था कुछ कहना चाहता है ,किन्तु उन परिस्थितियों में स्वयं को सँभाल लेना ही उचित था
धीरे धीरे वक़्त बहता ही चला जा रहा था,कभी कभी तो कब सामने से आते आते उसे  शरारत सूझ जाये शायद वो खुद नही जानता था।और कभी ऐसे बचकर निकल जाता था मानो हम उसे बंदीगृह में डाल देंगे  .कभी
रूबी श्रीमाली
रूबी श्रीमाली
एकदम खामोश बैठा रहता और आसमान को निहारता रहता न जाने क्या बातें किया करता था, वो शरारत करते ही अच्छा लगता था,उसके चेहरे की उदासी न जाने क्यों ह्रदय को विचलित कर जाती थी।
डर लगता था उसके नजदीक जाने से ऐसा लगता था मानो पास आने पर वो कभी लौटने ही नही देगा किसी जिद्दी बच्चे की तरह हाथ थाम कर खड़ा हो जायेगाये तो केवल मेरे मन की कल्पना थी कहा उसने कुछ भी न था,वो रोज एक गुलाब लाता हमारे हाथ में रखता और लौट जाता ,कभी उसने कोई हद पार करने की कोशिश नही की,इस तरह उसके लाये हुए गुलाब कब एक यादो का गुलिस्ता बन गए पता ही नही चला। 
उस दिन जब हम सो कर उठे तो न जाने क्यों मन इतना बेचेन हो रहा था जैसे कोईअपना हमेशा के लिए दूर जा रहा हो ,इससे पहले कि हम कुछ और सोच पाते वो हमारी तरफ  आते दिखाई दिया।आज क्या हो गया था उसे न उसके कदम लड़खड़ा रहे थे न वो खुद बस चला आ रहा थाहम वह से निकल ही जाना चाहते थे कि उसने हमारा हाथ थाम लिया .
"निवेदिता बैठो कुछ बात करनी है"
"निवि क्यों दूर भागती रहती हो मुझसे क्या इतना बुरा हु मैं"
इतनी मासूमियत के साथ उसने ये पूछा और हम बस उसे देखते ही रहे,कैसे कहते उसे कि हम तुमसे नही अपनेआप से भाग रहे हैं।
उसने पॉकिट से एक अंगूठी निकली और हमारी तरफ बढ़ा कर बहुत ही सहज भाव से कहा था .
"निवि  मुझसे शादी करोगी"
हम अब भी खामोश ही थे उसके जैसा लड़का हमसे कैसे प्यार कर सकता था हम कर भी क्या सकते थे उसके लिए,सारी दुनिया से लड़ लेते मगर अपनों को कैसे मनाते.उसकी बड़ी बड़ी खूबसूरत आँखों में आंसू उत्र आये थे, उसका प्रत्येक आंसू उसके प्रेम की सत्यता का प्रमाण था और हम उसे कुछ भी न दे सके सिवा एक इनकार और दर्द के उस पल उसकी पलको से गिरा प्रत्येक आंसू आज भी तिस बनकर ह्रदय को भेदित करता चला जाता हैं

                             -  रूबी श्रीमाली

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