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विलम्ब

आधुनिकता के चलते मनुष्य कितना व्यस्त हो गया हैं न जैसे एक मशीन को न करते हैं और वो अपनी क्षमता के आधार पर कार्य करती चली जाती है ठीक उसी प्रकार आज मनुष्य हो गया है,फर्क है तो सिर्फ इतना कि मशीनों
modernity
में जज्बात नही होते है और मनुष्य कभी भावनाओ से विरक्त नही हो सकता।
वो व्यस्त अवश्य हो सकता है किंतु भावनाओ से विहीन नही.एक मध्यमवर्गीय आदमी के पास इतना समय कहाँ होता है कि वो शुकुन के पल गुज़ार सके,परिवार की जिम्मेदारियां सम्भालते सम्भालते कब वो खुद को खो देता है वो शायद जान ही नही पाता है,परेशानियां तो जीवन का हिस्सा है सच पूछिए तो वो अध्यापक हैं जो जिंदगी को बेहतर तरीके से जीना सिखाती है ये अलग बात है कि मनुष्य इसे किस रूप में स्वीकार करता है उसका स्वयं का आकलन ही इसके महत्व को दर्शाता है।
ये उस वक़्त की बात है जब मैं अमरउजाला में रिपोर्टर का कार्य किया करता था सुबह घर से निकल जाना और देर रात घर लौटना एक मजबूरी सी हो गयी थी इस बीच इतना समय नही मिल पाता था कि मैं परिवार के साथ दो पल गुज़ार सकू.जिंदगी की रफ्तार इतनी तेज़ प्रतीत होती थी जैसे मैं वक़्त से बहुत पीछे रह गया हूं और वक़्त हैं कि भागता ही चला जा रहा है ।
उस रोज़ जब मैं ऑफिस के निकला तो मेरी नज़र एक बूढी औरत पर पड़ी, वो सड़क पार करने की कोशिश कर रही थी किन्तु वाहनों की रफ्तार बार बार उसके कदम रोक देती थी,
उस पल मुझे याद आया कि मुझमे अब भी भावनाये बाकी है मैं केवल काम करने वाली एक मशीन नही हु।
तब मैंने उस बूढी माँ को सड़क पर कराई और अपने रास्ते निकल गया फिर मैं व्यस्त हो गया अपनी रोजमर्रा जिंदगी में।
न ही वो ख्याल मुझे दोबारा आया न ही इतना सोचने का वक़्त मिला।किन्तु  जब अगले दिन मैं फिर उधर से निकला तो वो बूढी माँ फिर यातायात साधनों के बीच उलझी खड़ी थी आसपास इतनी भीड़ थी किन्तु मानवता दूर तक कही नजर ही नही आ रही थी मेने फिर उस बूढी माँ को सड़क के पार छोड़ दियाऔर मैं अपने रास्ते निकल गया।
अब मैं जब भी ऑफिस जाता तो उस बूढी माँ को वही खड़े पता था वो उसे सड़क पर कराना जैसे मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था।
रूबी श्रीमाली
रूबी श्रीमाली
वो कभी भी देर नही करती थी ऐसा लगता था मानो यदि उसने देर कर दी तो वो अपनी कोई अमूल्य निधि खो देगी।मैं नही जानता उसके ह्रदय में कितनी वेदना थी या फिर उसका ह्रदय वेदनाओं से विहीन हो चूका था या फिर वो पार कर चुकी थी उम्मीदों की वो सीमा जो ह्रदय में वेदनाओं को जन्म देती है
उस दिन मेरे पास जरा वक़्त था तो मैनेे उससे पूछ ही लिया कि वो खा जाती है वो भी इतनी समयबद्धता के साथ तो मालूम हुआ कि वो किसी लंगर से खाना लेने जाती थी।
अपना खाना खाने के बाद किसी भोलू के लिए पैक कराकर लाती थी।
ये क्रम निरन्तर चलता रहा न वो कभी लेट हुई न मै अपनी इंसानियत को छोड़ पाया।
किंतु उस रोज मैं थोड़ा लेट हो गया था और जब मैं पहुच तो वो वह नही था लेकिन एक भीड़ किसी लाश को घेरे खड़ी थी और जब मैने  उसे देखा तो सन्न रह गया ये तो वही बूढ़ी माँ थी ,जो इस संसार को सदा के लिए अलविदा कह चुकी थी और आजाद हो चुकी थी अपनी ज़िमेदारी से सदा सदा के लिए कोई वाहन उसे कुचल कर जा चूका था,उस पल का कसूरवार शायद मैं ही था यदि कुछ देर पहले पहुचा होता तो शायद वो जीवित होती।
किन्तु ये कैसा मानवता का परिवेश था जो भीड़ लगाये तो खड़ा था किंतु उस जिम्मेदारी को उठाने में असमर्थ था तब मैंने अपने दोस्त की मदद से उस बूढ़ी माँ के पार्थिव शरीर को उठाया और पता पूछते पूछते उसके घर पहुँचा जहाँ एक टुटा फुटा घर था  पड़ोसियों से कहा कि कोई भोलू को बुला दे तो मेरे चेहरे को ऐसे देख रहे थे जैसे मेने कोई व्यंग किया हो फिर एक छोटे से पिल्लै की तरफ इशारा करते हुए बोले कि वो बूढ़ी माँ उसे भोलू कहकर पुकारती थी।
अब तो ईश्वर की निर्दयता की हद थी भोलू उठा और उस बूढ़ी माँ के पास जाकर उसके पैर चाटने लगा उस पल मैं ये नही समझ पाया कि किसने ज्यादा खोया उस बूढ़ी माँ ने या उस भोलू ने जो टकटकी लगाए निरंतर उसे देखता जा रहा था ।


                                        रूबी श्रीमाली
                                    कस्बा बघरा 
                                     मुज़फ्फरनगर
                                      251306

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