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मै ही कहती हूँ

इस दफा तुम्हारे ज़ाहिर करने से पहले
साधना
साधना
लो..  मै ही कहती हूँ
जो सच का झुठ से , झुठ का सच से राजदारी है |
तुम भी खुलकर सामने अब आओ
शायद इसी में समझदारी है  |
तो सुनो...
यूँ ही नही सदिया तुम्हारी ड्योढ़ी पर गुजारी है..  |
रंग बदलते मौसमों में
रंग उतरते देखा है दीवारों से चेहरों तक के...
अंजान नहीं हूँ नादान दिल के अंजाम से
कभी कभी इसके लहू की सुर्खी आखों से उतारी है |
एक बेड़ी तोडी है रिवायतों की
तो कितनी ही बेड़िया जकड़ने को तैयार है
फिर भी दमघोंटू माहौल से हिम्मत नहीं हारी है |
कुछ इस तरह से भ्रम का भरम रखा है
कि उसी तरह अपनी खुदी भी मैने संवारी है |
अब देखना ये है उन बेहतरीन लोगों में तुम पर
किस तरह मेरा खुलूस कमतर है या भारी है ||

          ____________ साधना

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