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किसान

अन्न उगाता भूमि चीरकर, 
पाता नहीं है खाने को ।
नींव है भारत की किसान, 
जो तरस रहा है दाने को ।।
किसान
किसान

पत्थर दिल करके जो तपता ,
वह धूप से दिन भर लड़ता है ।
रग-रग मे चिंगारी भरकर, 
सम खून पसीना करता है ।।

आँखे खुलती सबसे पहले, 
वह कर्म को ईश समझता है ।
क्षुधा सभी की शांत करे,
न कोई इसे समझता है ।।

जिंदा है भारत उससे ही, 
और उसी से है यह अर्थवान ।
हर प्रगति उसी पर निर्भर है, 
ताकत भारत की है किसान ।।

जी तोड़ परिश्रम करता है, 
गम छोड़ वह आगे बढ़ता है ।
न कोई पर्व न मौसम है, 
निःस्वार्थ कर्म वह करता है ।।

फिर भी न उसकी इज्जत है, 
न ऊँचा उसका है स्थान ।
बिना किसानों के आगे, 
न रहेगा जिन्दा  "हिन्दुस्तान" ।।

                    .............शरद वर्मा

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  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन बुद्ध पूर्णिमा और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  2. बहुत सुंदर ! सत्यता के पट खोलती। आभार। "एकलव्य"

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