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कन्या धन

बेटी तो जननी सृष्टि की, 
बेटी पर टिका है जगतसार ।
बेटी तो माँ बहन बनी है, 
क्यों न समझे इनके अधिकार ।।
बेटी
बेटी

बेटी थी बनी गार्गी जब, 
वह विद्व हुई चौंका संसार ।
बेटी ही थी इन्दिरा जी,
सब व्यक्त जिनका आभार ।।

कन्या तो दिव्य ज्योति सी है, 
जो जलती परोपकार मे ही ।
कुर्बानी इनका ही गुण है, 
जिसमें सुख इनका निहित नहीं ।।

इनको भी जीने का हक है, 
इनको भी उड़ने का हक है ।
फिर छीने क्यों हाथों से कलम, 
इनको भी पढ़ने का हक़ है ।।

कन्या तो देवी का स्वरूप, 
इनकी आँखो में दिव्य क्रान्ति ।
कन्या की इज्जत जब होगी, 
तब जिन्दा होगी राष्ट्रशान्ति ।।

इनके हाथों में ताकत है ,
है शक्ति जो छू ले आसमान ।
गर मौका मिले बता दें ये ,
इनमें भी ऐसी है उड़ान ।।

गर हाथ बढ़ा दे ऊपर ये,
छोटा पड़ जाए आसमान ।
इनके दिल मेंं वह ममता है, 
जिससे जिन्दा है "हिन्दुस्तान "।।
शरद वर्मा
ग्राम / पोस्ट- मानपुर ,बाराबंकी
उत्तर प्रदेश, 225121
 
लेखक अभी उच्च शिक्षा हेतु अध्ययन रत है। लेखक के पिता का नाम - अवनीश वर्मा है जोकि पेशे से कृषक है ।             

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  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 15 मई 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर अभिव्यक्ति ,आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह!
    बहुत ही खूबसूरत रचना
    बिल्कुल बेटी की तरह..।।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेटी घर की आभा है ... परिवार की धुरी है ...
    बहुत ही सुंदर रचना है ...

    उत्तर देंहटाएं

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