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प्रेम की कल्पना

भागते भागते दोनों की सांसे फूलने लगी थी फिर भी दोनों एक दूसरे का हाँथ थामे लगातार भागे ही जा रहे थे करीब दोनों गांव से करीब ३ किलोमीटर आगे निकल चुके थे और अब धीरे धीरे हौशला पस्त सा पड़ने लगा था शरीर पसीने से बिलकुल लथपथ हो चूका था और पैरो में लड़खड़ाहट आने लगा था ...प्रेम इस बात को समझ रहा था की कल्पना अब ज्यादा दूर तक नहीं भाग सकती वो बिलकुल ही निढाल सी हुई जा रही थी .. कल्पना चौधरी भुवन सिंह की इकलौती लड़की थी और पुरे नाज और लाड प्यार से पली बढ़ी थी उसे दुनिया की हर ऐशो आराम मिला पर उसे वो कभी न मिला जो वो चाहती थी। .. उसे बचपन से एक ही चीज सिखाया गया की वो लड़की है और लड़कियों के पंख नहीं होने चाहिए , .उसे कोई हक नहीं ज्यादा ऊँचे क्लास तक पढ़ने का ..दसवीं क्लास तक पढ़ ली अब क्या करेगी ज्यादा पढ़ कर उसे हर बातों से बांध दिया गया जो चौधरी साहब के घरो में वर्षो से परम्परागत चली आरही थी  घर से अकेले कभी नहीं निकलना और किसी के साथ भी निकलो भी तो ज्यादा समय घर से बहार नहीं  रहना ....किसी भी अजनवी से बात तो दूर उसके तरफ भूल के न  देखना  ... अपनी इच्छाओं को हमेशा मार कर ही जीना..... और वो भी इन नियमो में बंध कर बखूबी निभाती ही आरही थी की वो सबसे बड़ी गलती कर बैठी .... प्यार करने की भूल .. जिसकी कोई माफ़ी न थी चौधरी साहब के नजरो में। ...कल्पना अभी उस उम्र के दहलीज पर कदम रखी थी थी की उसका टकराव प्रेम से हो गया। .. प्रेम चौधरी साहब के मुनीम राजाराम तिवारी का छोटा लड़का है जो अभी अभी शहर से बी.कॉम फाइनल ईयर का पेपर देकर कुछ दिन गांव घूमने आया था और एक दिन अपने पिता जी के संग चौधरी साहब की हवेली चला गया। चौधरी साहब ने भी खूब सम्मान दिया और दोपहर का खाना साथ खा कर जाने का बोल दूसरे काम में तिवारी जी संग व्यस्त वो गए और इधर प्रेम घर के बाहर बगीचे में नजर घुमाता घुमाता कल्पना  से नजरें टकरा बैठा और उसी एक नजर में दोनों एक दूसरे को दिल दे बैठे प्रेम भी काफी हैंडसम लड़का था जिसे कल्पना का दिल भी चाह कर नकार न सकी ...अब प्रेम किसी न किसी बहाने चौधरी साहब के घर आने जाने लगा और उनके परिवार में घुल मिल गया पर कल्पना और प्रेम की प्रेम कहानी से सभी अनभिज्ञ थे ....अब एक दिन सुबह चौधरी साहब की हवेली फूलो से जगमगा रही थी... प्रेम इस बात से अनजान किसी से कुछ पूछता की उससे पहले चौधरी साहब ने रौबदार आवाज में प्रेम को आवाज दिए... प्रेम इधर सुनो ...और प्रेम जब उनके पास पहुंचा तो वे बोले आज कल्पना को देखने लड़की वाले आ रहे हैं ,बड़े शहर से हैं और पूरी फैमली वेल एजुकेटेड है और उनका बहुत बड़ा कारोबार है तो मैं ये चाह रहा हूँ की ऐसे अच्छे बिरादरी वाले का  रिश्ते को हाँथ से न जाने दूँ तो  शाम में तुम भी हवेली  पर ही रहना ताकि उनकी अंग्रेजी फैमली के सामने हम कमजोर न पड़ जाए। .चौधरी साहब बोल कर आगे निकल गए और प्रेम वहीं खड़ा। ..हक्का बक्का सोंच में पड़ गया वो सीधा कल्पना के रूम में घुस कर उसके सामने जा खड़ा हुआ जवाब मांगे की उसने पहले क्यों नहीं बताया...और तभी कल्पना उसे देखते ही डोर की चिटकनी अंदर से लॉक कर प्रेम से लिपट कर फुट फुट कर रोने लगी ...प्रेम को उन सवालों  का  जवाब मिल चूका था कल्पना के आँखों में.. मुझे यहां से कहीं दूर ले चलो प्रेम... कल्पना के इस शब्द ने प्रेम में  हौसला दोगुना कर दिया। ..क्योकि कल्पना  और प्रेम दोनों को पता था की दोनों के इस रिश्ते को चौधरी साहब कभी न स्वीकारेंगे और  जरा भी इनके प्रेम मोहब्बत की भनक उनके कानो तक चली गई तो उलटे दोनों के गले में रस्सी डाल बीच चौराहे टाँग देंगे जैसा की आज तक इस गांव में बिरादरी की नाक के नाम पर यही तो होता आया रहा है। अब दोनों के पास भाग जाने के सिवा कोई और विकल्प नहीं बचा था अब दोनों शाम के अँधेरे का इंतजार कर रहे थे .. मेहमान आ चुके थे। .लोगो की भीड़ और गहमागहमी के बीच मेहमानो का सत्कार चल रहा था इधर मौका मिलते ही कल्पना पीछे के रस्ते से घर से निकल कर गली के चौमुहानी पर आगये और प्रेम भी। ...फिर दोनों ने पलट कर एक बार भी पीछे की ओर नहीं देखा बस भागते रहे....सड़क छोड़ कर जंगली रास्तो से पहाड़ो की तरफ भागते ही रहे और तब तक रात सर पर आचुका था पर वे दोनों निडर बेपरवाह भागे ही जारहे थे अब कल्पना का धैर्य जवाब दे चूका था तब  दोनों ने पहाड़ी के बीच रुकने का निर्णय लिया। आज पूर्णमाशी की रात थी और चांदनी भी अपने पुरे सवाब में।..
दोनों निढाल से जमीन पर एक दूसरे का हाँथ थामे लेटे पड़े  थे दोनों बस एक दूसरे को देखे ही जा रहे थे शायद ऐसे ही शांत प्रेम की कल्पना लिए बैठे हो... झरने की झरझराहट और नदी का कल कल कर बहने का स्वर उनके मौन चित को बहुत ही ठंढक दे रही थी तभी शांत वातावरण में करुण प्रेम वाणी में  कल्पना बोली - प्रेम तुम्हे पता हमने क्या किया है और इसका क्या अंजाम होने वाला है 
प्रेम - हाँ जानता हूँ और ये भी जानता हूँ की बिलकुल सही किया। तुम्हारे पापा के आदमी और उनके लोग अब तक जान भी चुके होंगे और हमे तलाशने निकल भी चुके होंगे। ...आज नहीं तो कल वे हमे तलाश ही लेंगे और हम दोनों को कंभी एक नहीं होने देंगें। ...फिर भी जितना वक्त तुम्हारे साथ हम दोनों एक साथ जी रहे है वही हमारे जीवन का सार्थक पल है। 

कल्पना - ओह्ह प्रेम वाकई मै भी तुमसे उतना ही प्यार करती हूँ और तुम्हारे साथ कुछ पल ही सही सम्पूर्ण तुम्हारी होकर जीना चाहती हूँ। ..आई लव यु  प्रेम 

अब कल्पना धीरे धीरे प्रेम के और समीप आजाती है इतने करीब की दोनों की सांसे आपस में टकराने लगे दोनों की धड़कन एक दूसरे से बाते करने लगे ...अब तो जैसे दोनों की प्रेम ने जैसे पुरे वातावरण को प्रेममय बना दिया। ... जिसका शाक्षी स्वयं प्रकृति थी... एक ऐसी लहर उठी की जलतरंगे बजने लगी। . पेड़ पौधे झूमने लगे। .. पंछी चहचहाने लगे। ....और वो दोनों एक दूसरे में विलीन हो गए  जैसे एक ही जिस्म और एक ही जान  ....
अचानक शोरो गुल से दोनों की आँखे खुली और वे दोनों जाग गए अब आवाजें बहुत समीप पहुँच चुकी थी खोजी कुत्ते की भौकने की आवाज भी साफ सुनाई पड़ रहा था। .... पर ये दोनों बेपरवाह भागने के बजाय एक दूसरे से सीने से चिपक से गए और अपने कपकपाते होठो की मुस्कान एक दूसरे में भरने लगे। ..आखों में आँशु छलक पड़े और वे फिर भी स्थिर। ....पूरा वातावरण सोरो गुल से भर चूका पंछियो में चीत्कार उठने लगी थी  शायद सभी को इनकी परवाह थी परन्तु ये दोनों बिलकुल बेपरवाह..... फिर दोनों ने अपने हाँथ की पकड़ को और मजबूत किया और पहाड़ी की उतंग से बहते झरने की तरफ बढ़ चले। ...शायद दोनों ने एक होने का निर्णय ले ही लिया था जिसे अब विधाता भी नहीं बदलने वाला  और अगले ही पल में बहुत तेज '''' छपाक""आवाज के साथ बहती धारा में कम्पन लहर तरंग उठा  और फिर  सब शांत। ....


विकाश शुक्ला 
राजू पार्क ,खानपुर 
नई-दिल्ली -110062

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