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नौका विहार

यात्रा ही जीवन का असली आनंद है . रेल यात्रा या बस से यात्रा तो प्राय : सभी करते हैं . परन्तु नौका द्वारा यात्रा करने का एक अनोखा आनंद होता है . पूर्णिमा की रात थी . हम अपने कुछ मित्रों के साथ वाराणसी के घाटों का अवलोकन कर रहे थे . ऐसे समय में ही हमलोगों को नौका बिहार करने की प्रबल इच्छा हुई . बस क्या था ,हमने एक नाविक को बुलाया एवं सभी सवार हो गए . 

दृश्य एवं आनंद 

 नौका विहार
 नौका विहार
हमलोगों ने अपनी नौका द्वारा राजघाट से यात्रा शुरू की . चाँदनी अपनी किरणों को गंगा जल एवं काशी के घाटों के नज़दीक बने भवनों पर बिखेर रही थी . अचानक रेलगाड़ी के आने का संकेत मिला .उस समय हमलोग पुल के नजदीक से ही नौका में सवार होकर घाटों को देखना चाहते थे . अर्ध चंद्रकार बसी काशी नगरी बहुत ही सुन्दर प्रतीत हो रही थी . घाटों पर बने देव मंदिर अपनी अद्भुत शोभा बिखेर रहे थे . एक के बाद दूसरे घात आने का क्रम लगा रहा . ब्रह्म घात ,पंच गंगा घाट ,सिंधिया घाट ,मृत कंटिका घाट  होते हुए हमलोग दश्वामेघ  घाट पहुँचे . हवा के तरंगों के साथ उछलती कूदती नौका रही .जल के धरातल से नाव का उठना व गिरना हमें झूले का सा आनंद दे रहा था .देखते ही देखते हमलोग नारद घाट भी आ गए .हमलोगों ने लौटने का निश्चय किया अब दो घंटों तक हमलोगों ने नौका बिहार का आनंद लिया . 

प्रभाव एवं अनुभव 

हमलोगों का यह प्रथम बिहार था . नौका बिहार के दृश्यों ने हमारे ह्रदय को बहुत आकर्षित किया .मंदिरों पर बने रंग - बिरंगे चित्र एवं बिजली की रोशनी ने हमें मंत्रमुग्ध कर दिया .आज भी यह स्मृति हमारे मानस पटल पर बिराजमान है . 

उपसंहार 

नौका बिहार प्रकृति के साथ तद्म्य स्थापित कर आनंद प्राप्त करने का सर्वश्रेष्ठ साधन है .हमें असली सुख की प्राप्ति प्राकृतिक दृश्यों को देखने में ही मिलती है . निश्चय ही यात्रा हमारे जीवन में एक मनोरंजन का क्षण लेकर आती है . 

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