1
Advertisement

जहां चलोगे साथ चलूंगी

लो छोड़ दिया
तुम्हारा शहर
और चल पड़ा हूं
नीना कौर
नीना कौर
ऐसे शहर की ओर
जहां चेहरे पर चेहरा
लगा न हो।
बस में बैठे बैठे
साथ वाली सीट पर
देख रहा हूं।
दो टिकट खरीदे
इस उम्मीद में कि
तुमने ही तो कहा था
जहां चलोगे
साथ चलूंगी।
ज्यों ज्यों बस
आगे चल रही है
पीछे छूटते जा रहे हैं
वो पल, वो एहसास
जो एक साथ
जिए थे हमने।
वो पार्क का बैंच
जिस पर बैठे थे कई बार
जहां मेरे कंधे पर
सर रखकर
तुमने कहा था
जहां चलोगे
साथ चलूंगी।
आज​ अकेला ही
चला जा रहा हूं।
पर इतना विश्वास है
कि खिड़की से आती
हवाओं में तुम्हारी
सांसों की खुशबू है।
जो मेरे साथ चल रही है।
क्योंकि तुमने कहा था
जहां चलोगे
साथ चलूंगी।

यह रचना नीना कौर जी द्वारा लिखी गयी है . आप अध्यापिका के रूप में कार्यरत हैं तथा स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य करती हैं . 

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top