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एक मेले की सैर
A visit to a fair

मुझे सन २०१४ में प्रगति मैदान ,दिल्ली में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला देखने का अवसर मिला . मेले का विज्ञापन करने के लिए आकाश में एक विशाल गैसीय गुब्बारा ताना गया था . जिस पर बड़े - बड़े शब्दों में व्यापार मेला लिखा था . 

मुख्य द्वार - 

मेले की सैर
मेले की सैर
व्यापार में प्रवेश करने के कई द्वार थे . मैं जिस द्वार से गया ,उसके उसके बाहर टिकट लेने वालों की सर्पाकार लंबी पंक्ति थी .वह पंक्ति बहुत अनुशासित थी . इसीलिए शीघ्र ही प्रवेश का मौका मिल गया . मुख्य द्वार और मार्ग को विविध कलात्मतक सज्जाओं से सजाया गया था . हमें दूर से ही बीसियों मोटे - मोटे नाम दिखाई दिए - आसाम ,हरियाणा ,मध्य प्रदेश ,दिल्ली ,पंजाब ,केरल ,जापान ,अमेरिका ,पाकिस्तान आदि . 

जर्मनी का मंडप - 

मैं इन रंगीनियो में खोया हुआ ही था कि अचानक स्वयं को एक मंडप में खड़ा पाया . यह जर्मनी का मंडप था . इसमें विविध आधुनिकतम सज्जाओं के साथ उस देश की प्रगति को दर्शाया गया था . 

घड़ियों वाला मंडप - 

आगे हाल ऑफ़ नेशंस के साथ एक छोटा भवन था जिसमें विश्वभर की घड़ियों की प्रदर्शनी लगी थी . अन्दर जाकर विविध घड़ियों के मण्डपों को देखा तो हैरान रह गया . एक - से - एक श्रेष्ठ गुणवत्ता वालों टाइम पीस ,क्लॉक तथा कलाई घड़ियों ने मन मोह लिया . मैं भी एक अलार्म घड़ी ख़रीदी . 

हरियाणा का मंडप - 

हरियाणा का मंडप देखने के लिए मुझे काफी दूर जाना पड़ा .लेकिन उस दूरी का अनुभव भी मनमोहक था . ऐसा लगता था जैसे सारी दिल्ली सज - धजकर उधर आ उमड़ी हो .कई मीलों में फैले प्रगति मैदान की सड़कें शाम ढल आने पर रंगीन हो उठी थी . आश्चर्य यह है कि कहीं कोई भगदड़ नहीं ,शोर - शराबा नहीं ,बल्कि ऐसी मंथर गति ,जैसे संध्या के समय समुंद्र मस्ती में लहरें ले रहा था . मूझे बहुत अच्छा लगा . 

वापसी -

रात घिर आई थी .मैं वापसी के लिए द्वार पर चला . आगे देखा - हजारों लोग एक ऊँचे स्थान पर मजमा लगाये खड़े हैं . पता चला कि कोई नाटक कंपनी नाटक खेल रही थी . वहीँ बहुत लंबी पंक्ति देखी जिसमें फैशन - शो देखें के इच्छुक लोग टिकट लेने के खड़े थे .मन हटता ही न था . जैसे - तैसे बाहर पहुँचा तो मुड़कर फिर से व्यापार मेले की ओर देखा रौशनी में जगमगाता हुआ मेला दुल्हन की तरह सजकर खड़ा था . 

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