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चांद से वाताँ

मुझसे चांद कहा करता है
गोरी किसकी यादों में खोयी
भूल गई सब साज श्रृंगार
चांद से वाताँ
रूप तेरा था बड़ा सुहाना 
कहां उसे तूने बिखराया
ओ चांद सुन!
तेरी शीतल चंद्रकिरणें
कहां हर पाती हैं दुख मेरा
मेरा साजन हुआ परदेशी
मेरा प्रेम भुलाये बैठा
रोज निहारू राह मैं उसकी
पाती उसकी कोई न आती
तू तो सारा जग घूमा करता
मेरे सजन का पता लगाना
बस उसकी कुशल मिल जाए
और कुछ न चाहिए मुझको
श्यामसुंदर सी उसकी छवि ने
मेरा जीना मुश्किल किया है
इस विरह के ताप को कोई
शीतल करने वाला नहीं है
ये वो आग है,दिखती नही है
पर इसके दाह से कोई
अब तक बच नहीं पाया है

यह रचना श्वेता सिंह चौहान जी द्वारा लिखी गयी है . आप अध्यापिका के रूप में कार्यरत है और स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य में संलग्न हैं . 

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