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मेरी पायल

उम्र के  संध्याकाल में ,
एक रोज --खोला पुराना संदूक ,
स्मृतियों के पन्नों  में सहेज कर रखी --एक पायल मिली !
ले गयी मुझे अतीत  के झरोखों के पार ।
संगीता गांधी
संगीता गांधी
तीन साल की "मैं" तब दादी ने पहनायी थी  छोटी सी पायल ,
सारे आँगन में फुदकती "मैं" करती थी --रुनझुन रुनझुन ।
समय बीता मेरे साथ साथ पायल भी बड़ी होती गयी ।
विवाह समय मामा लाये थे नयी  खूब भरी भरी पायल ,
ससुराल में दौड़ दौड़ जब काम करती तब खूब बजती थी मेरी पायल ।
वक़्त के साथ साथ पड़ने लगी पांवों में भी झुर्रियां ...
उम्र  के तकाजे और समाज के नियम मेरी "पायल" को  टोकने लगे !
"इस उम्र में पायल पहन घूमती है " ---सुना जब ये ताना ..आहत हुआ मन !
तब पहली बार  उतारी थी पायल ....सहेज कर रख दी संदूक में ।
बेटी ,बहु ,पोती --सबको दी पर उनकी आधुनिकता " पायल " से ऊपर थी !
पड़ी रही पायल मेरे संदूक में ।
आज डॉ ने कहा अब समय कम है !
जीवन  के कुछ अतिंम दिनों में  पंछी बन उड़ना चाहती हूँ !
तो निकाली पायल --थके , बूढ़े पैरों में पहनी ,
वही अनुभूति  झरोखों से छन कर उमड़ी .....
जब  "तुम " लाये थे मेरे लिए  खूब सारे घुंघरुओं से सजी पायल ,
अपने हाथों  से पहनायी थी तुमने ।
वही मादक अनुभूति ---आज तुम्हारी  स्मृति बन मेरे पैरों में सजी है ।
सांझ की इस बेला में  आज फिर मेरे पैर  नव यौवन  से दमक रहे !
एक  युग  का इतिहास संजोये आज भी चहक रही है मेरी " पायल" ।
रचनाकार -डॉ संगीता गांधी 
एम् फिल -
पीएचडी - 

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