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प्रेम के भाव

प्रेम के भाव निस्पंद से पड़ गये
देह के देह से नेह बढ़ने लगे।
प्रेम
प्रेम 

प्रीत के अर्थ अब हैं बदलने लगे
अर्थ में रूप में प्रेम पलने लगे।

आत्मा के मिलन का चलन अब कहां
प्रेमी राधा-किशन से मिथक अब लगे।

आस ही आस है ना समर्पण यहां
एक जनम में कई नेह जुड़ने लगे।

घंटों लिपटे रहे धर अधर पे अधर
पर हृदय प्रिय के प्रिय पढ़ ना सके।

था कैसा वो प्रेम, थे कैसे युगल
नाम राधा लिया कृष्ण झंकृत हुए।

नयी सोच की इस सघन बस्ती में
राग-अनुराग तो अब सपन से लगे।

प्रेम के भाव.......................
देह के.................................।

- तरु श्रीवास्तव


यह रचना तरु श्रीवास्तव जी द्वारा लिखी गयी है . आप कविता, कहानी, व्यंग्य आदि साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन कार्य करती हैं . आप पत्रकारिता के क्षेत्र में वर्ष 2000 से कार्यरत हैं। हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, अमर उजाला, हरिभूमि, कादिम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में बतौर स्वतंत्र पत्रकार विभिन्न विषयों पर कई आलेख प्रकाशित। हरिभूमि में एक कविता प्रकाशित। दैनिक भास्कर की पत्रिका भास्कर लक्ष्य में 5 वर्षों से अधिक समय तक बतौर एडिटोरियल एसोसिएट कार्य किया। तत्पश्चात हरिभूमि में दो से अधिक वर्षों तक उपसंपादक के पद पर कार्य किया। वर्तमान में आप ,प्रभात खबर समाचारपत्र में कार्यरत हैं.आकाशवाणी के विज्ञान प्रभाग के लिए कई बार विज्ञान समाचार का वाचन यानी साइंस न्यूज रीडिंग किया।

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