1
Advertisement

लिखने चली हूं

आज फिर लिखने चली हूं
कुछ जो मन में है।
कुछ जो जुबां पर है
और जो कुछ बिखरा पड़ा है
मेरे चारों ओर।
नीना कौर
नीना कौर 
वो शब्द जिन्हें मैंने
छोड़ दिया था अनजाने में
भाग रहे हैं मेरे आगे
और मैं बदहवास सी
भाग रही हूं उनके पीछे।

हार जाती हूं 
उन्हें पकड़ पाने में।
कलम भी हाथ से छूट रही है।
कितने अच्छे थे वो शब्द
जब वो मेरे अपने थे।
आज जान कर भी नहीं
पहचान रहे हैं।
ओ कलम
तूं ही मेरी अपनी है
न जाने कितने सपने 
खुली आंखों से दिखाए हैं।
न जाने कितने अनजाने
तूने अपने बनाए हैं।

शब्दों का मायाजाल

शब्दों के अनकहे अर्थ
शब्द शब्द बिखर गए हैं
चारों ओर
रुको
सुनो
तुमसे ही बोल रही हूं।
आह
 थक गया वजूद
सो रही हूं मैं
जागती आंखों में
सपने बो रही हूं मैं।

यह रचना नीना कौर जी द्वारा लिखी गयी है . आप अध्यापिका के रूप में कार्यरत हैं तथा स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य करती हैं . 

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top