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इश्क रिस्क

मैं  आया   था   करने   कुछ ,  कर   कुछ   और   बैठा।
इश्क रिस्क
कॉलेज लाइफ में मस्ती की, उसी दुनिया से तार जोड़ बैठा।
किताबों की दुनियां छोड़,मस्ती की दुनियां में ज्यों ही इन्ट्री मारी।
कॉलेज की सारी लड़कियां ,  मुझे  लगने लगी बहुत प्यारी।
मेरा कॉलेज में मन ही मन में, मुस्करा के यू ही हँसना।
इतने में ही एक छोरी ने, मुझे बना लिया था अपना।
फिर मैं उसी छोरी की दुनियां में, ज्यो ही ताल से ताल मिलाना चाहा।
तभी अचानक दूसरी छोरी ने, मेरे दिल का दरवाजा खटखटाया।
मैं खामोश ,अचम्भा होके बोला, हे प्रभु, कैसी है ये तेरी माया।
फिर मैंने सोचा की अब, कैसे इस मुशीबत से निपटू।
किसको बनाऊ अपना,और किसको दूर झिटकूँ।
ये सब मैंने अपने दिमाग में,जितनी तेजी से गढ़ा।
मेरे कदम डगमगाए,पैर रत्ती भर भी आगे न बढ़ा।
इन सब से निपटने को,मेरे दिमाग़ में एक रास्ता सूझा।
और मैंने चुपके चुपके से ,इस प्यार के किस्से को बूझा।
फिर मैंने चोरी चुपके ,दोनों को खुश करना चाहा।
तभी  अचानक  एक  कुड़ी  ने  ,  ऐसे  इन्ट्री  मारी।
देख के मेरे रोम रोम थर्राए,उसने ऐसे अखियों से गोली मारी।
उसकी इस अदा से , मैं हो गया मसहूर।
दोनों ने रिश्ते तोड़े, तब मैं था ही बेबस मजबूर।
फिर मैंने अपना आपा , सिर्फ इसलिए खोया।
कि प्रभू ने आखिर मुझे , ऐसा क्यों धोया।
इतने में तीनो ने कर लिया ,अपना सीधा उल्लू।
और मेरे हिस्से में बचा सिर्फ , बाबा जी का ठुल्लू।
फिर मैंने इस मोह माया से, ऐसे पलटी मारी।
और सबके लिए बन गया मैं ,बाल ब्रह्मचारी।।

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अभिनव कुमार त्रिपाठी 
(बी.टी. सी., बी.पी. एड.)
     

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