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चश्मे का फ्रेम


बांकी-चितवन,
भोली-सी सूरत,
और - 
चश्मे का फ्रेम
मासूम अदा !
वो 
क्लास में -
तिरछी नजर से
मुझे देखते देख
तुम्हारा -
मंद-मंद मुस्कुराना !

नाजुक उंगलियों में फंसी 
कलम से 
कागज के पन्नों पर
कुछ शब्द-चित्र उकेरना!
और -
उन्हीं उंगलियों से,
नाक तक सरक आये
चश्मे को -
बार-बार 
ऊपर करना !

उफ़ ! 
वो चश्मे का फ्रेम !!
और -
फ्रेम-दर-फ्रेम
मेरे बिखरते सपनों का
फिर से -
संवर जाना !!

2. उफ़ !
--------

शिल्पी से -
उसका शिल्प।
चित्रकार से -
उसकी कूची।
गायक से -
विजयानंद विजय
विजयानंद विजय 
उसकी गायकी।
कलाकार से -
उसकी कला।
रचनाकार से -
उसकी कलम
छीन लो।
और -
कह दो
जी ले!

उफ़!!
कितना मुश्किल होता है
सपनों का मर जाना !
या कि -
मरते सपनों के साथ
जीना !
या -
सपनों के साथ -साथ 
मर जाना !!

3.सपने
----------

जी चाहता है
मिटा दूँ
ज़र्द हो चुके
पन्नों पर लिखी
हर इबारत।
आँखों से
अंतस में
उतर आये
इंद्रधनुषी रंगों का
आकल्पन।
क्योंकि -
फ़र्क होता है
चटख़ रंग
और -
स्याह रंगों से
ज़िंदगी के 
कैनवास पर
बने -
रेखाचित्रों में।
जितना फ़र्क है
सपने और
हक़ीक़त में!!

- विजयानंद विजय 
  " आनंद निकेत "
  बाजार समिति रोड
   बक्सर - 802103
   शिक्षा - एम.एस-सी; एम.एड्.
   संप्रति - अध्यापन ( राजकीय सेवा )
   निवास - आरा ( भोजपुर )
   संपर्क - 9934267166

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  1. जीवन सरल है किन्तु कठिनाइयाें से पलायन कायरता है। मानव जीवन विचित्र है, साहित्य मानव काे देवता बना देता है।

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