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कलियुगी शिक्षा

मैं तो था बिल्कुल अनपढ़।
पर था बुद्धि से अच्छा।
सोचा बच्चो को अपने हम।
दे दें अच्छी शिक्षा।।
शिक्षा
     उनको शिक्षित करना है।
     मैंने मन में ठाना।
     शिक्षा कैसे देना है।
     मैंने समझा और जाना।
पहुच गया विद्यालय में।
दिखे प्रिंसिपल मुझको।
हाथ जोड़ कर बोला साहब।
राह दिखाओ मुझको।
      साहब बोले बात क्या है।
      मुझे बताओ आप।
      मैंने बोला दो बच्चो का।
      बन बैठा हूँ बाप।
उनको अच्छी शिक्षा देना।
मैंने मन में ठानी।
सोच रहा कही रह न जाये।
मेरे जैसे अज्ञानी।
      हुआ दाखिला बच्चो का ।
      हो गए शिक्षित बच्चे।
      अपने विद्यालय में रहते ।
      हमेशा सबसे अच्छे।
बच्चे शिक्षित हो गए जब।
मैंने कोशिस की जारी।
आगे कैसी लाइन दिखाऊ।
करने लगा तैयारी।
       मैंने जब बुद्धि लगाई।
       समझ में आया मुझे कुछ तब।
       फर्स्ट क्लास वाले बनते है।
       डॉक्टर या इन्जीनियर सब।
सेकंड क्लास वाले बनते है।
मास्टर साहब नेक।
बोलते इनको शिक्षित कर।
बनाये डॉक्टर,इन्जीनियर अनेक।
      थर्ड क्लास वाले बन जाते ।
      नेता बड़े महान।
      अपने अंडर मे रखते है।
      चाहे डॉक्टर,इंजीनयर हो या गुरु श्रीमान।
इसके आगे क्लास न कोई।
होते सीधे फेल।
जो बन जाते साधू संत।
देते सबको ठेल।
      सारे इनका ही चक्कर।
      रोज लगाते फिरते।
      दान दक्षिणा इनको।
      रोज बहुत ही मिलते।
मैंने देखा शिक्षा को।
उल्टी ही बहती यहाँ।
फिर कैसे सुधरेगा सिस्टम।
थर्ड क्लास नेता और फेल साधू हो जहाँ।।।।

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      अभिनव कुमार त्रिपाठी
                                     (बी.पी.एड, बी.टी.सी.)

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