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सपनो का दुशाला

सुनो,
जब मै जाऊंगी..
तो छोड़ जाऊंगी अपने पीछे वो सारी रौशनी
जिसके उजाले में मैने
बुना था वो सतरंगी दुशाला
साधना सिंह
साधना सिंह 
और उसपर उकेर दिये थे अपने सारे सपने
वो दुशाला भी तुम्हे सौंप जाऊंगी ,
वो सारी रौशनी तुम्हें रास्ता दिखायेगी ,
जब तुम भटकते हुये खंडहरों से खाई तक बढोगे..
हाथ थाम तुम्हारा
तुम्हें ज़िन्दगी की तरफ लौटा लायेगी ।
परन्तु एक इल्तिज़ा है तुमसे
मेरा वो सपनो वाला दुशाला जला देना।
हाँ...
सही सुना तुमने
मैने यही कहा..  कि जला देना वो दुशाला
क्योंकि वो सपने तो पहले ही खाक है ,
तो दुशाले का मोह कैसा
जला देना ।
और उस दुशाले की राख
बहा देना किसी गंगा में
कुछ फूलों के साथ..
  इस तरह विदा करना
फिर तुमसे बिना शिकायत
मै ज़िन्दगी के एक नये सफर पर निकल चलूंगी
तुम अपनी दुनिया मे लौट जाना...


__________ साधना सिंह 
           गोरखपुर 

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