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उनींदा बचपन

किताबों के बोझ तले
बचपनउनींदा और सहमा बचपन
रोया-रोया सा
खोया-खोया सा
कभी डराकर
कभी धमकाकर
और कभी तो पीट-पीटकर
भेजा जाता स्कूल को बचपन
हमारे देश के नौनिहाल
आने वाले कल के कणॅधार
पीठ पर लादे बस्ते का बोझ
अनमने और खीझतें
स्कूल से आते
और टयूशन न जाने के
जाने कितने बहाने बनाते
कभी-कभी तो लगता ऐसा
जैसे ये बच्चे किसी सजा को भोग रहे
खेलने-कूदने की उम्र में
मोटे-मोटे किताबों से बेतरह जूझ रहे।


यह रचना श्वेता सिंह चौहान जी द्वारा लिखी गयी है . आप अध्यापिका के रूप में कार्यरत है और स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य में संलग्न हैं . 

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