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पतझड़

खिड़कियाॅ सारी बंद करो, 
अब पतझड़ आने वाली है।
ये रूत है सूखे पत्तों की,
हवा भी जैसे सरसराती।
डाल से फूल गये हैं सूख,
पतझड़
पतझड़
हर जगह है फैली धूल।
इक्के-दुक्के लोग हैं दिखते,
सुनसान हो गयी सारी राहें।
थके पथिक करें विश्राम,
नहीं कहीं मिलता आराम।
बच्चे रूठे घर में बैठे,
गृहिणी अनमनी सी दिखे।
वसंत की सारे राह अगोरे,
छुप गया संसार छोड़कर।
देवालय भी सूना पड़ा,
प्रस्थान कर गये सारे देव।
पनघट पर नहीं है गागर,
प्यासे कंठ,प्यासे ओठ।
कौवा बेचारा पानी को तरसे,
गइया प्यासी पड़ी रंभाती।
हर जगह वयाप्त सूनापन,
ये कहां आ गये रे मन।

आधार

छोटे से जीवन की साथी,
लंबी सी है बड़ी कहानी।
छोड़ो भी अब,
रहने दो!
श्वेता सिंह चौहान
श्वेता सिंह चौहान 
दुख ददॅ मेरे मन के,
मन में ही उनको रहने दो!
क्या करोगे जानकर उसको,
मेरी व्यथा मुझसंग ही रहे!
बड़े यत्न से उसे भुलाया,
अब याद न मुझे दिलाओ!
मेरा जीवन जग को दिखाकर,
क्या पा लोगो कविता लिखकर।
नहीं, मैं अपनी कहानी सुनाती,
जो खोया उस पर न पछताती!
जो पाया उस पर नहीं गुमान!
छोटा सा है जीवन मेरा,
बड़ा सलौना,
बहुत सुहाना,
जी लेने दो मुझको खुलकर!
पत्नी हूँ तुम्हारी,
ये सत्य है,
मेरे पुराने प्रियतम तुमहीं,
मेरे जीवन के आधार!


यह रचना श्वेता सिंह चौहान जी द्वारा लिखी गयी है . आप अध्यापिका के रूप में कार्यरत है और स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य में संलग्न हैं . 

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