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एक अदद भरोसा 

एक अदद भरोसा
मुझे भी दे दो
जिससे मैं तुम्हें रख सकूँ
डायरी में सूखे गुलाब की पंखुडि़यों के समान
एक अदद भरोसा
मेरा भी ले लो
डा० महेन्द्र नारायण
डा० महेन्द्र नारायण
जिससे तुमको लगे कि -
मैं कोई भँवरा नही हूँ
जो कली कली फूल फूल
बाग दर बाग
भटकता रहता हूँ
मात्र सपने बेचने से क्या होगा ?
धरती पर तो आना ही है
एक दिन
प्रेम का फेसबुक
हृदय के उस मैसेन्जर पर हमें ले जायेगा
जिस पर हमें न कोई देख सकता है
न पढ़ सकता है और  न सुन सकता है
फिर तुम्हारे द्वारा प्रेषित 
तुम्हारे छायाचित्र को देखकर
मैं समझ लूँगा कि -
मुझे तुम्हारा वह सब कुछ मिल गया है
जिसका मैं कभी आकांक्षी भी नही था.

देख लेना

बैलगाड़ी से दिन
ढो रहें हैं तुम्हें
वर्ना तुम कहाँ थे ?
पगडण्डियों सा विचार लेकर चलने वाले
सपने राकेट यान हैं
तुम्हारे
समय तुम्हारा
हड़प्पा की सभ्यता को गूँथ रहा है
तुम समझते हो कि -
मैं फाइव जी के इण्टरनेट पर बैठा हूँ
कब तक
तुम्हारा भ्रम तुम्हें सुलाकर रखेगा
कभी तो सुबह होगी
वह सुबह अण्टार्टिका पर नही होगी
अपितु नाश्ते हेतु ब्रेड की जुगाड़ में होगी
जब तुम्हारी पत्नी
अपने भूखे बच्चे की सौगन्ध देगी 
देख लेना

डा० महेन्द्र नारायण
लगभग 3हजार विभिन्न विधाओं में रचनाएं, अनेक प्रकाशित, मुक्तिरेखा' व 'द्रौपदी की दुम ' दो कहानी संग्रह प्रकाशित पिछले २५वर्षों से निरन्तर डायरी लेखन
प्रधान सम्पादक "प्रेरणा"(कालेज पत्रिका)
सम्पर्क -----श्री चन्दन लाल नेशनल कालेज काँधला शामली उ०प्र०247775
मो०नं० 9412637489

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