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अपने

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रेड लाइट पर कार रुक गई। पिछली सीट पर बैठे मखीजा जी ने खिड़की के बाहर देखा। स्कूल यूनीफॉर्म में एक बच्चा मोटरसाइकिल पर बैठा था। उसने अपने पिता को कस कर पकड़ रखा था। मखीजा जी ने सामने की तरफ देखा। जैसे अपने बेटे के चेहरे में कुछ तलाश रहे हों।
बेटे ने झुंझलाते हुए अपनी पत्नी से कहा "कह रहा था थोड़ा जल्दी करो। मुझे दफ्तर के लिए देर हो जाएगी।"
"तुम हर बात का दोष मुझे क्यों देते हो। मेरी भी आज मीटिंग है। देर मेरी वजह से नहीं हुई" बहू ने पीछे देखते हुए कहा।
मखीजा जी फिर से बाहर देखमे लगे। ग्रीन लाइट पर कार पुनः चल दी। कुछ ही मिनटों में वह गंतव्य पर पहुँच गए।
मखीजा जी ने सीट पर रखा बैग उठा कर कंधे पर लाद लिया। बिना  कुछ कहे ओल्ड एज होम के भीतर चले गए।

यह कहानी आशीष कुमार त्रिवेदी जी द्वारा लिखी गयी है . आप लघु कथाएं लिखते हैं . इसके अतिरिक्त उन लोगों की सच्ची प्रेरणादाई कहानियां भी लिखतें हैं  जो चुनौतियों का सामना करते हुए भी कुछ उपयोगी करते हैं.
Email :- omanand.1994@gmail.com

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