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भारतीय महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण और राष्ट्रोत्थान 

सशक्तिकरण
भारत के आधुनिक विकास में महिलाओं के क्रमशः बढ़ रहे आर्थिक सशक्तिकरण ने देश को एक नया आयाम दिया है, जिसे पहचानने की दृष्टि और दृष्टिकोण दोनों चाहिए। आज भी अधिकांश लोग बिना किसी सोचविचार या विश्लेषण किए रटेरटाए जुमले बोलते रहते हैं कि भारत में महिलाओं की स्थिति बुरी है और उनको आगे लाने के प्रयास करना चाहिए। मुझे समझ में नहीं आता कि प्रायः लोगों को इन वाक्यों से आगे बोलना क्यों नहीं आ पाया है, यहां तक कि अनेक महिलाएं भी इसी तरह की टिप्पणियां करती पाई जाती हैं। विकास यदि हुआ है या हो रहा है तो उसे स्वीकार करने में कैसी झिझक? या फिर इसके दो कारण हो सकते हैं, एक पुरुषप्रधान प्रवृत्ति जो कहीं इस महिला सशक्तता से डरी हुई होती है कि उनकी स्वीकारोक्ति की मोहर स्वयं उनके लिए ही परेशानी का सबब न बन जाए। और दूसरा कारण स्वयं स्त्रीभीरु प्रवृत्ति है, जो अन्य महिलाओं की सशक्तता को स्वीकार इसलिए नहीं करना चाहती कि सहानुभूति बटोरने की उनकी आदत पर अंकुश लग जाएगा। अर्थात् अब तक भारतीय नारियों में जो आर्थिक सशक्तिकरण बढ़ा है, उसे न स्वीकारने के मूल में सिर्फ और सिर्फ एक पूर्वाग्रही भय है। 
लेकिन ऐसे दुराग्रही भयों से कोई सच्चाई छिप नहीं सकती, बल्कि सच यही है कि आज भारतीय नारी ने अपनी स्वनिर्णय लेने की प्रवृत्ति के बल पर गांवों से लेकर शहरों तक अपने आर्थिक सशक्तिकरण के हस्ताक्षर भारतीय पटल पर कर दिए हैं। किसी भी मानवीय या सामाजिक पहलू में कमियां होना स्वाभाविक है और महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण में यदि छोटी-मोटी कोई न्यूनताएं नजर भी आती हैं, तो उस विशालता को नकारा नहीं जा सकता जो प्रत्यक्ष दिख रही है। ऐसा तो नहीं है कि स्वतंत्रता के बाद से भारत में सरकारें कोई भी रही हों, लेकिन महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण हेतु योजनाएं लगातार बनती रही हैं और लाभ भी उठाए गए हैं। 
भारत में यूं भी महिलाएं अपने अपने घरेलू आर्थिक प्रबंधनों में आरम्भ से ही पूरा पूरा दखल देती आई हैं, अपवादों के उदाहरण कम ही होते हैं। इन चंद उदाहरणों को ही कुछ लोग अप्रगति का माध्यम बनाकर कुप्रचार करते हैं। भारतीय महिलाएं साक्षर भले ही न रही हों लेकिन उनको मूढ़मती की श्रेणी में कदापि नहीं रखा गया। जबकि एक समय था जब भारत के पुरुषवर्चस्व प्रवृत्ति वाले समाज में महिलाएं केवल घरों के कामकाजों तक सीमित होती थीं और बाहर की पूरी अर्थव्यवस्थाएं पुरुषों का उत्तरदायित्व होता था। लेकिन शनैः शनैः युग बदले, सामाजिक मानसिकताओं ने करवट लीं, महिलाएं शिक्षा और रोजगार के प्रति जागरुक हुईं और इस जागरुकता ने उनमें आत्मनिर्भरता को प्रस्फुटित किया। इस सोच ने काफी तीव्रता से प्रगति की और सरकारी व गैरसरकारी संगठनों ने बढ़ावा देकर भारत में महिलाओं की स्थिति बेहद सुदृढ़ बना दी है। यह एक सुखद पहलू है। 
हमारे यहां अक्सर यह माना जाता है कि वे परिवार जहाँ स्त्रियां शिक्षित होती हैं वहां उनकी पीढ़ियां ज्ञानवान बनती हैं, क्योंकि एक स्त्री स्वयं अपने लिए नहीं बल्कि अपने पूरे परिवार के प्रति समर्पण का भाव लेकर चलती है। यही भाव भारतीय महिलाओं को किसी भी तरह की संकटमय परिस्थिति से भी उबार पाने में सहायक बनता आया है, क्योंकि अपने परिवार के जीवन-निर्वाह के आशक्त समय में वह कहीं अधिक सशक्त हो जाती हैं और ऐसे में चिरकालिक निर्धनता की संभावनाएँ कम हो जाती हैं। वैसे भी भारत में अधिकांशतः गरीबी एवं आर्थिक संकट के बोझ से जूझते अत्यधिक निर्धन परिवारों का संचालन महिलाएं ही करती देखी गई हैं, क्योंकि ऐसे घरों के पुरुष मदिरासेवन करने वाले और निकृष्ट स्तर के होते हैं। अतः महिलाएं ही इस आर्थिक असंगति को झेलते हुए अपने स्तर पर प्रयास करके बच्चों के लिए पालन-पोषण का इंतजाम करती हैं। 
भारत में उच्चशिक्षित महिलाओं की सँख्या अपेक्षाकृत कम है, लेकिन मध्यमवर्गीय, निम्नमध्यमवर्गीय और गरीबी में रह रही महिलाएं बहुत अधिक हैं, जो अपनी घरेलू आय की आपूर्ति के लिए आय के वैकल्पिक स्रोतों द्वारा अपने उत्पादक कार्यों में वृद्धि करने के लिए निरंतर प्रयासरत रही हैं। आज की महिला आर्थिक सशक्तिकरण की दर में हुई वृद्धि इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। उन्होंने अपनी बुद्धि और समय का सदुपयोग कर अपने हुनर के हिसाब से भोजन सामग्री जैसे पापड़, अचार, चटनी, मसालों का उत्पादन से लेकर अन्य कला प्रक्रियात्मक उद्यमों जैसे मालाएं, झाडू, चटाई आदि बनाकर इसके अलावा कशीदाकारी, सिलाई-बुनाई, केले या नारियल या जूट के रेशों की वस्तुएं जैसे खिलौने एवं कृत्रिम आभूषणों के निर्माण द्वारा वैकल्पिक आय के साधन खोज निकाले हैं। इससे वे घर पर रहकर ही स्वयं के आर्थिक सशक्तिकरण के साथ साथ घर के कामकाज और बच्चों की परवरिश के उत्तरदायित्वों का भी निर्वहन कर रही हैं। इस तरह नवीन कल्पनाओं और मूल्यों के आधार पर कुछ सरकारी व गैरसरकारी सामाजिक संगठनों के सहयोग से व्यापक स्तर पर भी अपने स्वरोजगार को बढ़ाकर महिलाएं आय का स्वतंत्र स्त्रोत जुटा पाने में सफल होती जा रही हैं। ऐसा करने से जहां वे आर्थिकरुप से सक्षम बन रही हैं, वहीं उनमें अपने अधिकारों के प्रति आत्मविश्‍वास एवं आग्रह भी मजबूत हुआ है। एक समय दूसरे दर्जे की समझी जाने वाली महिलाओं ने अपनी आर्थिक सशक्तता के बल पर परिवार के सदस्यों के बीच एक विशेष सम्मान एवं प्रतिष्ठा बनाई है। अब घरों में सभी बातों के लिए महिलाओं की राय भी अधिक महत्व रखने लगी है। ऐसे परिवर्तन समाज में पुरुषों की महिलाओं के प्रति बदल रही सोच का भी परिचायक है। कुछ लोग कह सकते हैं कि ये आदर्शवादी बाते लगती हैं इनमें यथार्थता की कमी है, तो वे बिल्कुल गलत हैं। आवश्यकता उनकी अपनी सोच बदलने की है, क्योंकि महिलाओं ने अपने स्तर पर स्वयं को आर्थिक रुप से सशक्त बनाकर समाज को एक नई दिशा दी है। 
आज भारतीय परिवेश में जहां महिलाएं हर क्षेत्र में उच्चपदों पर आसीन हुई हैं, वहीं ग्रामीण महिलाएं कृषिकार्य में सक्रियता से जुड़ी हैं। आर्थिक विपत्ति तथा पुरूषों की बढ़ती बेरोजगारी के कारण ही सही लेकिन परम्परागत एवं सामाजिक व्यवस्था के बंधनों को तोड़कर एक बड़ी संख्या में घर से बाहर निकल कर काम करने के लिए बाध्य हुईं मध्यमवर्गीय भारतीय महिलाएं भी स्वरोजगार कार्मिकों के रूप में एवं प्रबंधक व प्रशासनिक पदों पर कार्मिकों के रूप में अपनी सशक्त भागीदारी सिद्ध कर रही है। 
इस सदी के पूर्वार्ध से ही नए सामाजिक नियमों, कानूनों एवं क्रियात्मक व्यवस्था के साथ निम्न स्तर तथा कठोर जीवन परिस्थितियों के बावजूद अपने साहस, शकित तथा दृढ़ निश्चय का परिचय देते हुए हर भारतीय महिला ने प्रत्यक्ष व परोक्ष रुप से संरचनात्मक समायोजन से संदर्भित स्वचालन एवं नर्इ न्यूनतम श्रम-प्रधान तकनीक द्वारा निर्यात क्षेत्र का संचालन करने वाले चालीस विकासशील देशों में से अधिकांश देशों के सामुदायिक उद्योगों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की दर में कमी के परिणामस्वरूप औद्योगिक पुनर्निमाण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। महिलाओं की ऐसी प्रगतिशील क्षमता को दृष्टिगत रखते हुए ही इक्कीसवीं सदी के प्रारम्भ से ही उनके आर्थिक विकास के लिए विशिष्ट कार्यक्रम व योजनाएं तैयार की गईं। इनके उद्देश्य न केवल महिलाओं को सेवाएँ तथा सुविधाएँ प्रदान करना रहे, वरन् उनकी आर्थिक स्थिति एवं आर्थिक आत्मनिर्भरता में सुधार करना भी है। भारत की आर्थिक नीतियों में महिलाओं के लिए सकारात्मक रूप से सामाजिक सशक्तिकरण और लैंगिक समानता के लक्ष्यों को बढ़ावा देने के साथ साथ उनके आर्थिक सशक्तिकरण का भी ध्यान रखा जाता है। इसके अन्तर्गत महिलाओं की आश्रय की आवश्यकता, सुरक्षा, बचाव, कानूनी सहायता, न्याय, सूचना, मातृ-स्वास्थ्य, खाद्य, पोषण के साथ-साथ उनके कौशल के विकास, शिक्षा तथा उनकी साख एवं बाज़ार तक पहुँच के द्वारा उनकी आर्थिक आजीविका की आवश्यकताओं को शामिल किया गया है। इनका लाभ उठाते हुए भारतीय महिलाओं ने स्वयं को आर्थिक रुप से सशक्त बनाया है। 
डॉ. शुभ्रता मिश्रा
डॉ. शुभ्रता मिश्रा
इतनी आर्थिक सशक्तता के बावजूद भी भारत में महिलाओं पर होती घरेलू हिंसा, बलात्कार, दहेज, हत्या, यौन शोषण एवं अत्याचार के आंकड़े यद्यपि बेहद निराशाजनक हैं। यहां तक कि कुछ महिलाएं पोषण के गिरते स्तर, स्वास्थ्य सेवाओं के बढ़ते मूल्य तथा आय के साधन के रूप में देह व्यवसाय पर आश्रित होने के कारण एड्स जैसी महामारी का शिकार भी होती हैं। इस बुरे पक्ष का जब विश्लेषण करते हैं तो कभी कभी मन निराशा में घिरने लगता है कि श्रम के नारीकरण तथा अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के विकास से क्या एक ऐसी अर्थ-व्यवस्था ने जन्म ले लिया है, जिसमें महिलाओं के लिए विशाल आर्थिक अवसरों से समाज में पुरुषों की स्थिति कहीं दुर्बल होने से पुरुष समुदाय कुण्ठित हो रहा है। या फिर कहीं महिलाएं दुराग्रहवश सामाजिक सशक्तीकरण या लैंगिक समता की प्राप्ति के लिए विद्रोही तो नहीं बनती जा रही हैं। ये दोनों ही पहलू एक समग्र राष्ट्रोत्थान के लिए अति चिंता का विषय है, क्योंकि किसी भी राष्ट्र की प्रगति में महिला और पुरुष दोनों की भागीदारी समान होनी चाहिए। इस बात की पुष्टि स्वयं हो जाती है कि दुनिया में कोई भी देश सभी पहलुओं पर क्यों आजतक विकसित नहीं हो पाया है, क्योंकि पुरुष वर्चस्वता इसका कारण रही है। जहां कहीं भी जिस क्षेत्र में विशेष उन्नति हुई है, वहां दोनों की भागीदारी समान रही है। 
यह अलग बात है कि मनोवैज्ञानिक स्तर पर महिलाओं में परिवार, समाज या अपने देश के प्रति चेतना की प्रवृत्ति पुरुषों की अपेक्षा अधिक दिखार्इ देती है। लेकिन इसका कारण भी यह हो सकता है कि सामान्यतया महिला ही घर की सभी समस्याओं से जूझती है और सुधार कर पाने में भी उसकी भागीदारी अधिक होती है। पर क्रमशः विश्व के साथ साथ भारत में भी पुरुषप्रधान सामाजिक मनोवृत्ति में बदलाव आने लगे हैं, जिसके मूल में कहीं न कहीं महिलाओं की आर्थिक सशक्तता अवश्य है। 
इस समय आर्थिक स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय औद्योगिक प्रतियोगिता और उदारीकरण अथवा विदेशी निवेश के लिए विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के द्वार खोले जाने के चलते लोकतांत्रिक उद्योगों की जीवनक्षमता काफी प्रभावित हो रही है। ऐसे में भारतीय महिला आधारित लघु घरेलू उद्योगों के अस्तित्व और विकास को बड़ी चुनौतियों का सामना भी करना पड़ रहा है। आजकल तकनीकी एवं सूचनात्मक व्यापार के चलन की वृद्धि से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भी बाजार का महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभाव पड़ना शुरू हो गया है। अतः राष्ट्रोत्थान के लिए आर्थिक विकास हेतु एक बराबर की साझेदारी का विकास करना बहुत आवश्यक है, जिसमें भारतीय महिला और पुरुष समान रुप से आर्थिक विकास में भागीदार बनें। आर्थिक महिला सशक्तिकरण भारत के लिए अभी भी चुनौती है, लेकिन इसी रफ्तार से यदि यह बढ़ता गया तो वह दिन दूर नहीं जब भारत दुनिया में विश्वशक्ति बनकर उभरेगा और इस शक्ति की वास्तविक शक्ति भारतीय नारी शक्ति होगी। सही कहा गया है कि कोर्इ भी वास्तविक सामाजिक परिवर्तन तब तक संभव नहीं हो सकता, जब तक प्रत्येक समाज पुरुषों एवं महिलाओं के मध्य समानता, समान उत्तरदायित्त्व एवं पारस्परिक सम्मान की भावना पर आधारित संबंधों के आधार पर नए मूल्यो को स्वीकार नहीं कर लेता।  

डॉ. शुभ्रता मिश्रा वर्तमान में गोवा में हिन्दी के क्षेत्र में सक्रिय लेखन कार्य कर रही हैं । उनकी पुस्तक "भारतीय अंटार्कटिक संभारतंत्र" को राजभाषा विभाग के "राजीव गाँधी ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार-2012" से सम्मानित किया गया है । उनकी पुस्तक "धारा 370 मुक्त कश्मीर यथार्थ से स्वप्न की ओर" देश के प्रतिष्ठित वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है । इसके अलावा जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा प्रकाशक एवं संपादक राघवेन्द्र ठाकुर के संपादन में प्रकाशनाधीन महिला रचनाकारों की महत्वपूर्ण पुस्तक "भारत की प्रतिभाशाली कवयित्रियाँ" और काव्य संग्रह "प्रेम काव्य सागर" में भी डॉ. शुभ्रता की कविताओं को शामिल किया गया है । मध्यप्रदेश हिन्दी प्रचार प्रसार परिषद् और जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा संयुक्तरुप से डॉ. शुभ्रता मिश्रा के साहित्यिक योगदान के लिए उनको नारी गौरव सम्मान प्रदान किया गया है।
          संपर्क सूत्र -  डॉ. शुभ्रता मिश्रा ,स्वतंत्र लेखिका, वास्को-द-गामा, गोवा, मोबाइलः :08975245042,
          ईमेलः shubhrataravi@gmail.com

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