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महिला दिवस बनाम सब दिवस

सुनो,  दुनिया वालो
पुरुष का हर दिन ,
महिलाओं का 
साधना सिंह
साधना सिंह 
केवल एक दिन ? 
केवल एक दिन उधार का 
एहसान की तरह हमारे गोद मे डाल कर
बाकी दिनों के लिये निश्चिन्त हो जाओगे। 
वह भी कागज के पर बिना हस्ताक्षर 
एक पल हमारे नाम कर जाओगे । 
औचित्य क्या है? 
नीहित उद्देश्य क्या है?  
अट्टहास करने को मन करता है,  
एक दिन नहीं 
हर दिन जब स्त्री समान अस्तित्व स्वीकार करो , 
जब सुरक्षा के लिये दिन और रात की 
फिक्र से महिला को आजाद करो 
उस दिन वास्तव मे महिला दिवस की जरूरत ना होगी । 
उपर मन से बधाई दे कर्तव्य का इतिश्री करने वालो,  
अन्तर मन से महिलाओं द्वारा दिये गये योगदान 
को स्वीकार करो,  
ये अंगीकार करो कि 
एक नहीं,  हर दिन हमारी ही बदौलत पुरा होता है। 
बताऊं कैसे?  
सृष्टि का सृजनकार हम 
घर मे संवारते हैं,
गंगा सी हिमालय का 
पांव हम पखारते हैं, 
मिलाकर सबसे कंधे 
अंतरिक्ष तक उघाड़ते हैं ,
जो कल तुुम्हारा आता है 
उसे आज हम सजाते हैं, 
सब कर दिखाते हैं 
पर शेखी नहीं बघारते हैं,  
खैर छोडो, 
आधा दुनिया तुम से है तो
आधा दुनिया हम बनाते हैं । 
यानि महिला दिवस बनाम सब दिवस ।। 
             _______ साधना सिंह 

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