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सावित्री

वर चुना तो वरण किया,
अल्पायु जानकर भी,
मुँह न मोड़ा उसके प्रेम से,
सामना किया हर दुख का,
सावित्री
सावित्री
राजकन्या होकर भी,
गृहिणी का जीवन जिया था!
अंधे अपने परिजनों को,
बड़े यत्न से संभाल लिया था!
सुख के झूले में झूली थी,
पालकी पर ही चलती थी!
पति घर का आकर वो राजकुमारी,
हर कष्ट को सहती चली थी!
पति से उसका प्रेम था ऐसा,
अपने पति के लिए तड़पती,
सम्मुख खड़ी हो गयी मृत्यु के,
शक्ति थी सिदूंर की,
जिसने इतना बल दिया था!
छुई-मुई सी नारी में,
साहस का संचार किया था!
एक सती की महिमा ने,
यमराज को भी लौटा दिया था!
युगों से चलती आयी कहानी,
सावित्री की थी जिसकी रानी!

यह रचना श्वेता सिंह चौहान जी द्वारा लिखी गयी है . आप अध्यापिका के रूप में कार्यरत है और स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य में संलग्न हैं . 

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  1. सावित्री की कहानी हर नारी के लिए शिक्षाप्रद हैं, जिसने यमराज से अपने पति के प्राण वापीस लाये, उसका दृढ़ निश्चय और विश्वास ने उसकी जीत कर दी, सावित्री के प्यार को दिल से नमन्

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