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सारा आकाश का नायक समर

राजेन्द्र यादव कृत "सारा आकाश " उपन्यास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पात्र समर है . यह इस उपन्यास का नायक भी है .क्योंकि उपन्यास कि सम्पूर्ण कथा का केंद्र बिंदु समर है .उपन्यास की नायिका प्रभा का वह पति है ,फला- फल की प्राप्ति उसे होती है . कथावस्तु में निहित घात - प्रतिघात का संवाहक भी वही है .अतः प्रत्येक दृष्टि से इस उपन्यास का नायक समर है . 
समर
समर
चित्र सौजन्य - गूगल.कॉम 
उपन्यास का नायक समर १९- २० का युवा छात्र है . उसका जन्म और लालन - पालन माध्यम वर्गीय परिवार में हो रहा है जिसमे ९  सदस्यों के संयुक्त परिवार का भरण - पोषण बाबूजी के २५ रुपये कि पेंशन तथा धीरज भाई के १०० रुपये के वेतन से किसी प्रकार चल रहा है . समर ,राणा - प्रताप ,शिवाजी ,दयानंद सरस्वती आदि को आदर्श पुरुष मानता है . उसमे राष्ट्रीयता प्रबल है . वह एम् .ए . करके महान व्यक्ति बनने की भावना उसे निरंतर कुरेदती रहती है . उसे रहन - सहन भी अत्यंत सरल है . समर के चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ है :- 

१. महत्वाकांक्षी एवं स्वप्न दृष्टा :- 

समर महत्वकांक्षी एवं स्वप्न दृष्टा प्रकट है .इसी भावना से प्रेरित होकर वह विवाह नहीं करना चाहता .उसका विश्वास है कि स्त्री प्रगति के मार्ग में बाधक है . वह एम्.ए करके महान पुरुष बनना चाहता है . इसी कारण विवाह के लिए जल्दी तैयार नहीं होता बाद में विवाह हो जाने पर पत्नी से न बोलने का संकल्प लेता है . 
प्रूफरीडर की नौकरी पाने पर उसके सपने और ऊँचे हो जाते है . अच्छे डिवीज़न से एम्.ए करके प्रोफेसर बनने का उसका सपना निकट दिखाई देता है . 

२. भावुकता :- 

समर अत्यंत भावुक युवक है .वह उपन्यास में कदम - कदम पर अपनी भावुकता का परिचय देता  है . देश प्रेम में आजीवन कुँवारा रहना ,पत्नी के विषय में सोचना ,पिता के समक्ष फूट - फूट कर रोना भावुकता ही तो है भावुकता से ही प्रभा को वह कभी शत्रु मानता है और कभी पत्नी .भावुकता के कारण उसमें दृढ निश्चय का अभाव है .किसी बात पर चिंतन ,मनन करके किसी उचित सही तथा व्यवाहरिक निष्कर्ष पर पहुँच पाने कि क्षमता उसमें नहीं है .उसका मस्तिष्क परिपक्व नहीं है . 

३. अध्यनशील :- 

उपन्यास में समर को अध्यनशील युवक के रूप में दर्शाया गया है . घर की विषम परिस्थितियों में भी वह अपने अध्ययन की उपेक्षा नहीं करता है ,उसमें जुड़ा रहता है. विवाह और पत्नी भी उसे अध्ययन से पृथक नहीं कर पाते . उसके अध्ययन का ही परिणाम था कि वह इंटर में दूसरी श्रेणी में पास हो जाता है और भाई अमर फेल हो जाता है . 

४. पलायनवादी :-

 अत्यधिक भावुकता तथा निराशावादी से समर पलायनवादी युवक बन गया है . परिस्थितियों के अघात को वह सहन नहीं कर पाटा है . बात - बात में वह बिखर जाता है .उसकी निराशा दर्शनीय है - "उनकी बात सच्चाई दिल को चीरती चली गयी . नहीं नहीं मेरे लिए कोई भविष्य नहीं है कोई जगह नहीं . अपनी धमनियों में राणा प्रताप तथा शिवाजी का रक्त समझने वाला समर अत्यंत भीरु और कायरपुरुष है . पत्नी का सामना होते ही वह पौरुषहीन बन जाता है . इसीकारण से वह घर छोड़कर भागने के लिए बाध्य हो जाता है . ट्रेन में बैठकर भी वह अनिश्चय की हालत से गुजरता है . 

५. आस्तिक युवक :- 

समर, भारतीय संस्कृति ,धर्म तथा ईश्वर  पर विश्वास करता है . इसी भावना से वह मंदिर जाता है और धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन करता है . दिवाकर के यहाँ जब शिरीष धर्म ,हिंदुत्व ,वेद ,ईश्वर आदि की आलोचना करता है तो उसे वह सुनना पसंद नहीं करता है . 

६.क्रोधी प्रकृति :- 

समर में बहुमुखी क्रोध है . एक ओर वह नारी भावना को लेकर प्रभा के प्रति क्रुद्ध है तो दूसरी ओर अर्थ स्वार्थ को लेकर परिवार के प्रति क्रुद्ध है .बात बात में पत्नी एवं माता -पिता के प्रति क्रोध प्रकट करता रहता है . नौकरी छूट जाने पर प्रभा की चूड़ियाँ पहनना भी उसे सहन नहीं होता है और वह उन्मत्त होकर उन्हें फोड़ देता है .अन्य लड़कों तथा लड़किओं का सानंद जीवन व्यतीत करते देखकर भी वह चिढ़ता रहता है . 

७. स्वार्थ ग्रस्त युवक :- 

समर में स्वार्थ की भावना प्रबल है .वह अपने माता - पिता को भी स्वार्थान्धता में भूल जाता है .वह छोटी सी नौकरी पाते ही अपनी वास्तु अपने खर्चे तथा अपनी पत्नी के विषय में सोचने लगता है .

इस चारित्रिक विशेषताओं के साथ साथ समर आत्मविश्लेषण तथा पौरुषहीन युवक है .उसमें निराशा कूट -कूट कर भरी पड़ी है .वह अपने जीवन और संबंधों में कहीं खरा नहीं उतरता .न ही उसे आदर्श पति कहा जा सकता है न आदर्श पुत्र और न तो आदर्श भाई .उसका चरित्र अत्यधिक गतिशील और अस्थिर है . उसे मनोविकार कुंठित युवक कहें तो उसके लिए सार्थक और उपयुक्त हैं . 

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