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सारा आकाश उपन्यास में मुन्नी 

सारा आकाश उपन्यास में मुन्नी पात्र सबसे संवेदनशील और दुखी पात्र है . वह पति द्वारा परित्यक्ता होकर और भी असहाय और अबला बन गयी है . वह समर से २ वर्ष छोटी है . वह ऐसी अभागी लड़की है जिसके भाग्य रेखा से केवल दुःख ,प्रताड़ना ,अपमान और पीड़ा है .पति द्वारा वह जो यातना पाती है ,वह असाधारण है फिर भी वह चुपचाप उसे सहन करती है . उसके पिता ठाकुर साहब १६-१७ वर्ष की अवस्था में उसकी शादी कर दी है . ससुराल में जाते ही उसे बहुत यातना सहनी पड़ती है .उसके दुर्भाग्य पूर्ण जीवन के समबन्ध में समर इस प्रकार संकेत करता है :-
"ससुराल से मुन्नी के बड़े ही करुणापूर्ण ख़त आते .यहाँ विलख - विलख कर रोती . सास और पति मिलकर जो जो अत्याचार करते उन्हें किसी से कह भी तो नहीं सकती थी ..... नौकरानी की तरह अपनी और अपनी रखैल की सेवा करवाता और दो - दो ,तीन - तीन दिन खाना नहीं देता था और भी न जाने कितने कहने - कहने अत्याचार किये .मुन्नी तो बतलाती ही नहीं थी .रात - रात भर इसकी दोनों हथेलियों पर खाट के पाए रखकर इससे कुढ़ने और जलाने को अपनी आनंद क्रीडा के प्रदर्शन किये जाते और एक दिन सारे शरीर पर कई बेतों के फूले निशान लेकर मुन्नी सुबह - सुबह फिर हमारे यहाँ आ गयी . "
इतना बड़ा अत्याचार वह मूक भाव से सहती रही .वह पति के विरुद्ध कभी कुछ नहीं कहती .अन्दर ही अन्दर घुटती रहती है . उसकी दशा मूक -निरीह गाय जैसी रहती है . जिस समय उसके पिता जी उसकी विदाई करते है ,वह कहते है - "बाबू जी तुम मुझे जहर देकर अपने हाथ से मार डालो,मेरा गला घोट दो ....मुझे वहाँ मत भेजो ... मैं मर जाऊँगी ." और सचमुच एक दिन वह मार डाली जाती है . उसकी सहनशीलता और मूक पीड़ा के सम्बन्ध में अत्यन्त्र लिखा गया है ."मुन्नी तो पता नहीं कुछ सोचती भी है या नहीं .अधिक से अधिक चुप और तटस्थ रहना उसका स्वभाव हो गया है .
मुन्नी पीडित है .अतः वह प्रभा की पीड़ा को जानती है .वह समर तथा प्रभा के बीच अच्छा सम्बन्ध चाहती है . विदाई के समय जाते - जाते वह कहती है :- "भैया भाभी से बोलना .उन्होंने कुछ भी नहीं किया .वह निर्दोष है ".संक्षेप में मुन्नी चरित्र एक भाग्यहीन ,दुखी नारी का चित्र है . 

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