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होली

होली
रंगों से भरी
होली
होली
पिचकारी में भरी

दौड़ रही है
खेतों खलिहानों में

भाभी लिपटी है
सुबह से
गुझिया बनाने में

देवर ताक रहा है
भाभी को रंग अबीर
लगाने के लिये

बच्चे
मस्त हैं हुड़दंग में

गाँव में
बना है रसभंगा

बूढ़े,बच्चो में
चढ़ा है
होली का रंग

कितना पावन
लगे यह पर्व

खुशी है
चहुँ ओर

बार बार आये
यह पर्व

सब मिल कर गायें
होली के गीत

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(2)

बसंत


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बसंत
आया है

नये नये
कपड़े पहने

धीरे धीरे
मुश्कान लिये
अंगड़ाई लिये

चुपके चुपके
बागों में पहुंचा है

उठा है
मन में लहर

बसंत की
इस पुरवाई में

बही है
बसंती रंग

फूलों पर
रेंग रहे हैं भौरे

मन में
उठ रहे
हिलोर

पत्ते गिर रहे हैं
डालों से

सोंधी महक से
महका है
घर आँगन

आया है
बसंत

देखो
आया है बसंत

कवि जयचन्द प्रजापति 'कक्कू'
जैतापुर,सियाडीह,हंडिया,इलाहाबाद
मो.7054868439

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