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दिन का चाँद

कलम ने गर हृदय लिखा होता
दिन का चाँददिन में तारों के संग चाँद भी दिखा होता
भूलते हम न चौराहों पर अपने घर का पता
अगर आने का इधर सिलसिला रहा होता ।
खो गए उम्र की दहलीज पर हम अनजाने
झांक पाये न घर के भीतर क्या है क्या जाने
अगर हमको भी कोई आसरा मिला होता
हक़ीक़त औ तसव्वुर का फासला मिटा होता।
बीतते दिन भी मेरे रोशनी में लिपटे हुए
अंधेरों से न कोई वास्ता रहा होता
कोई काँटा न कभी चुभता पैरों में मेरे
अगर जंगल से दूर आशियाँ रहा होता ।
मुझे छूकर हवाएं प्रायः हो जाती हैं खामोश
कुछ कदम चल कर मिट जाता है जवां दिलों का जोश
न थकता मैं कभी इस दौर में भी चलते हुए
संग में यदि फतह का फलसफा रहा होता ।
कलम ने गर हृदय लिखा होता
दिन में तारों के संग चाँद भी दिखा होता ।


सुखद राम पांडेय
विवेक विहार,हावड़ा

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