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राजनीति का रंग

कई सालों से
देख रहा हूँ
राजनीति का रंग
कभी लाल
कभी पीला
राजनीति का रंग
बहा रही है आसूँ
बन गई है
भरी जवानी में
विधवा

राजनीति कहती है
बेटा को
बाप पर भरोसा नहीं करना चाहिये
पिस रही है
आम जनता
बाप बेटे की राजनीति से
अम्मा बाबू
परेशान हैं मँहगाई से
और बच्चू बाबू
जातिवादी राजनीति से

टीवी ऑन हुआ है
बड़ी बड़ी बाते हुई हैं
बड़े बड़े नेता
कुर्ता पायजामा पहने
लगा रखें हैं
नये नये मुखौटा
घर में दाल नहीं है
एटीएम दस बजे खुलेगा
बबुआ का सात बजे स्कूल है
राजनीति के चक्कर में
बबुआ आज भूखा रह गया

चुनाव आया है
राजनीतिक रंग लाया है
नये नये चेहरा लिये
बाप बेटे हैं
आमने सामने
कैसा है यह धंधा ?
अच्छा है धंधा
दोनों की रोटी
एक ही जगह बनती है
यही है राजनीति का रंग
सचमुच अच्छा है धंधा

कवि जयचन्द प्रजापति 'कक्कू'
जैतापुर, हंडिया, इलाहाबाद
मो.07054868439

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