0
Advertisement

बेहिसाब दर्द सहकर 

गर रोने से दर्दो ग़म का
मिटना मुमकिन होता!
तो दुखियों के अश्कों में
जमाना बह गया होता !
श्रीमति अलका जैन
श्रीमति अलका जैन

2, न खुशी की सराय है कोई
न ही सुकून-ए-डेरा है!
दिल की शाख पे बस
दर्दों ग़म का बसेरा है !

3, फकत इक दर्द से तुम
इतने मायूस हो गये,
बेहिसाब दर्द सहकर भी
देखो मुस्कुरा रहे है हम !

4, मेरे अफसाने ने मुझे उससे
बहुत दूर कर दिया
दर हकीकत का किस तरह
में उसे इत्त्ला करू !

लेखिका- श्रीमति अलका जैन, 
पता- बस-स्टेन्ड रानीपुर, जिला-झांसी उ.प्र.

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top