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सपनो से समझौता

घर से निकला बिटिया से वादा कर गुड़िया उसकी लाएगा , 
बिटिया पर खाली हाथ हैं जाता कैसे उसे समझाएगा , 
सजल नयन मासूम हृदय वो बाँट मेरी जोहती होगी, 
हाॅय विधाता कैसी विडंबना कैसे लाचारी दर्शायेगा ।
याद आया वह समय जब पहली बार अंक मे आई , 
उसने पावन कदमों से गरीब की कुटियाँ महकाई , 
सारे सपने सच करूँगा खुद से किया था ये वादा , 
लेकिन इस गरीबी मे पिता की आस है मुरझाई ।
वही सड़क पर बैठ गया सर पकड़ कर वह अपना , 
रिक्त हाथ लेकर मैं पहुँचु क्या तोड़ू एक ओर सपना, 
तभी एक गुबारे वाला वहाँ से था गुजर रहा ,
एक गुबारा ले बैठा कम हुआ थोड़ा थकना ।
घर पहुँचा गुबारा लेकर पुलक मन से लिपट गई ,
अम्मा बापू गुबारा लाए कहकर अंदर दौड़ गई ,
विधाता ने वह दिन दिखलाया जिसकी राह देखता था , 
हाँ मेरी बिटिया भी सपनों से समझौता करना सीख गई ।

पुष्पा सैनी 
गुड़गाँव हरियाणा

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