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दर्द रोते है खूब

वो साज बनकर जीते है हम राज बनकर जीते हैं !
वो शबे शोहरत बनकर हम आवाम बनकर जीते हैं !
प्यार

नजाकत इतनी बची सिर्फ वो तारीफ हो गये ,
वो फनकार बनकर हम तमाशगीर बनकर जीते हैं !

खरोच उनके बदन पर ऐसी दर्द रोते है खूब ,
वो खरी धूप बनकर हम मजदूर बनकर जीते हैं !

कब बिखरे बिखरे होगें नजारों के तिनके जमी ,
वो सफा आग बनकर हम जंगल बनकर जीते हैं !

शौक है उनका चलना पाबंन्द है मुझे जरा सा बढना ,
वो छूरे की धार बनकर हम नाखून बनकर जीते हैं !

यह रचना राहुलदेव गौतम जी द्वारा लिखी गयी है .आपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की है . आपकी "जलती हुई धूप" नामक काव्य -संग्रह प्रकाशित हो चुका  है .
संपर्क सूत्र - राहुल देव गौतम ,पोस्ट - भीमापर,जिला - गाज़ीपुर,उत्तर प्रदेश, पिन- २३३३०७
मोबाइल - ०८७९५०१०६५४

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